(पौराणिक कथाओं के अनुसार)
पिछले अंक में हमने पढ़ा..... प्राचीन काल में दधीचि नाम के एक महर्षि थे, जो वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और दयालु स्वभाव के थे। एक बार देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र उनके आश्रम में रखे, जिन्हें महर्षि ने बाद में शक्तिहीन कर दिया। जब देवताओं को उनकी आवश्यकता हुई, तो महर्षि ने अपनी अस्थियों का दान दिया, जिनसे उनके अस्त्र-शस्त्र बनाए गए। इस प्रकार महर्षि दधीचि ने अपनी देह देवताओं की भलाई के लिए त्याग दी। शेष भाग....
लेकिन जब उनकी पत्नी 'गभस्तिनी' वापस आश्रम में आई तो अपने पति की देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने की जिद करने लगी। तब देवताओ ने उन्हें बहुत मना किया, क्योंकि वह गर्भवती थी। देवताओं ने उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी। लेकिन गभस्तिनी नहीं मानी। तब सभी ने उन्हें अपने गर्भ को देवताओं को सौंपने का निवेदन किया। इस पर गभस्तिनी राजी हो गई और अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर स्वयं सती हो गई। दधीचि द्वारा देह त्याग देने के बाद देवताओं ने उनकी पत्नी के सती होने से पूर्व उनके गर्भ को पीपल को सौंप दिया था, इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।
जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन किसी प्रकार सुरक्षित रहा।एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।
तब नारद ने ध्यान धर देखा। नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की आयु में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।
इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति मांगी। ब्रह्मा जी से वर मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आंखे खोलकर भस्म करना शुरू कर दिया। शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे। अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए। ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-
1- जन्म से 12 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा। जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।
2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उस पर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।
ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया। तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे। अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए। सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है। आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की, जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है । यही कारण है कि आज भी शनि की शांति के लिए पिप्पलाद, गाधि और कौशिक ऋषियों का स्मरण किया जाता है।
शनि ग्रह जन्मकुंडली के किसी भी भाव में स्थित हो सकता है, पर उसकी साढ़ेसाती या ढैय्या जैसी स्थितियाँ छोटे बच्चों पर उतना गहरा असर नहीं डालतीं, जितना वह युवावस्था या प्रौढ़ावस्था में करती हैं।
परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि शनि का प्रभाव बिल्कुल नहीं होता।
यदि किसी बच्चे की कुंडली में शनि की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो, या वह नीच का हो, शत्रु राशि में हो, या 6ठे, 8वें या 12वें भाव में स्थित होकर अशुभ दृष्टि डाल रहा हो, तो उसका प्रभाव परोक्ष रूप से बच्चे के जीवन में देखा जा सकता है। यह प्रभाव सामान्यतः बच्चे के वातावरण, शारीरिक स्वास्थ्य, या माता-पिता की परिस्थितियों के माध्यम से अनुभव होता है।
यह समझना भी आवश्यक है कि केवल शनि ही जिम्मेदार नहीं होता।
राहु, केतु, मंगल, चंद्र और सूर्य जैसे अन्य ग्रहों की भूमिका भी बच्चों के स्वभाव, व्यवहार और परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती है। कई बार बाल्यकाल के कुछ कष्ट पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम भी हो सकते हैं, जिनका समाधान समय, संस्कार और सहृदय प्रयासों से संभव है।
शनि से जुड़े सरल उपाय
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शनिवार को शक्कर मिश्रित आटा व काले तिल मिलाकर चींटियों को डालें।
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सूखा नारियल लेकर उसमें शक्कर भरें और पीपल के पेड़ की जड़ में रखें, ताकि जीव-जन्तु उसका सेवन कर सकें।
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शुक्रवार को सवा पाव काले चने भिगो दें और शनिवार को उन्हें काले कपड़े में एक रुपये के सिक्के, थोड़ा कच्चा कोयला, कुछ काले तिल के साथ बांध कर सात बार सिर से वार कर बहते जल में प्रवाहित करें।
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शनि दोष हो तो काले कपड़े या काली वस्तुओं का उपयोग बच्चों के लिए सीमित करें।
अंत में यह याद रखें:
बच्चों का भाग्य और भविष्य केवल ग्रहों के अधीन नहीं होता — सही मार्गदर्शन, सकारात्मक माहौल और प्रेमपूर्ण परवरिश से बहुत कुछ बदला जा सकता है। ज्योतिष केवल संकेत देता है, समाधान हमारे संस्कारों और कर्मों में छिपा होता है।
(संग्रहित)
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