मेरे घर के आगे रोज कोई नींबू जिसके अंदर शायद सिंदूर लगा रहता था, फेंक कर चला जाता था। मैं इन सारी…
Read more »बड़ी देर तक रायसाहब खुशीराम की नजरें कोठरी की छत को घूरती रहीं। छत पर जगह-जगह पलस्तर के टुकड़े उतरे…
Read more »प्रातः की कुनकुनी धूप चारों ओर फैल चुकी थी। दिसम्बर माह का अंतिम सप्ताह चल रहा था। मौसम में अच्छी ख…
Read more »बात उन दिनों की है जब महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की रणभूमि अब एक श्मशान सम…
Read more »बौराए आम के पेड़ वाले आंगन से आती खड़खड़ाहट की आवाजें। लगता है, अम्मा ने फिर आज बर्तन वाली बाई के ल…
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