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पाप का बोझ | Emotional Family Story in Hindi


पाप का बोझ | Emotional Family Story in Hindi - www.saralvichar.in

प्रातः की कुनकुनी धूप चारों ओर फैल चुकी थी। दिसम्बर माह का अंतिम सप्ताह चल रहा था। मौसम में अच्छी खासी ठंडक घुल चुकी थी। मैंने नाश्ता किया और बाहर कुर्सी निकलवा कर आराम से अखबार पढ़ने लगा। अखबार की तारीख पर जैसे ही मेरी दृष्टि गई न जाने क्यों उस तारीख को देखकर मैं सहम सा गया... तारीखें भी कैसी-कैसी होती हैं ?

प्रत्येक माह में आती हैं, लेकिन साथ ही हमारा कितना कुछ जा चुका होता है। केवल शेष रह जाती हैं मीठी-कटु स्मृतियां ।

मनोज कार्यालय जाने के लिए निकल रहा था, उसकी पत्नी उसे स्नेह से देख रही थी। मनोज जाते-जाते मुझसे कहकर गया- 'अच्छा पापा, बॉय-बॉय ।'

'बॉय, बेटा।' मैंने कहा और वह कार्यालय के लिए निकल गया। अंदर से विभावरी का स्वर आ रहा था। वह छोटे-छोटे काम में मीनमेख निकाल कर बहू को या नौकरानी को डांटने का बहाना ही खोजती रहती है, लेकिन मुझे मालूम है वह मन ही मन अपने पुत्र और बहू दोनों से कितना प्रेम करती है।

मैंने समाचार पत्र को पढ़कर एक ओर रखा कि सामने के दरवाजे से विभावरी हाथ में सब्जी लाने का झोला लिए मेरे पास आ खड़ी हुई। मैंने ऐनक को एक ओर रखकर उसे देखा और पूछा- 'बाजार जा रही हो ?'

'तुम्हें मालूम तो है।' उसने कहा ।

'हरी मटर और गाजर लेती आना।' मैंने उससे कहा।

'मुझे मालूम है तुम्हें क्या पसंद है ?' कहकर वह दरवाजे से बाहर निकल गई ।

अन्दर बहू संध्या काम में लगी थी। उसको वैसे इन दिनों अधिक काम करना नहीं चाहिए, किन्तु वह मानती कहां है ? दिन भर काम में लगी रहती है। किसी काम से संध्या बाहर आई, मुझे अकेला बैठा देखकर कहने लगी, 'बाबूजी, चाय पीयेंगे ?'

'बना लाओ, पी लेंगे। तुम भी यहीं बैठकर चाय पीना ।' मैंने कहा।

'ठीक है, बाबूजी ।' कहकर संध्या चाय बनाने के लिए अंदर चली गई। उसे देखकर अतीत की ढेर सी स्मृतियां मन में ताजा हो उठीं।

जब मुन्ना पेट में था तब मैं विभावरी को हमेशा कम काम करने की सलाह देता था, लेकिन वह भी दिन भर काम में लगी रहती थी। कभी होने वाले मुन्ने के लिए स्वेटर, -कभी पांव के मौजे, कभी छोटे-छोटे बिस्तर वगैरह ... न जाने क्या-क्या।

खिलौने भी खरीद कर रख लिए थे। वह कैसे मधुर क्षण थे, जब हम दोनों प्रकृति के उस उद्भुत करिश्मे को देखने की प्रतीक्षा में एक-एक पल गिन रहे थे।

और आखिर एक दिन विभावरी का कार्यालय में फोन आया कि वह ठीक अनुभव नहीं कर रही है। मैंने तुरन्त छुट्टी ली और सीधा घर पहुंचा। वहां से हम अस्पताल की ओर चल दिए थे। विभावरी मेरे परेशान चेहरे को देखकर अपनी पीड़ा को भूलकर मुझे ही बार-बार समझाने का प्रयास कर रही थी। विवाह के लगभग 7-8 वर्ष पश्चात् मान-मनौती एवं औषधियों के बाद घर में एक मेहमान आने के कारण मेरा उत्सुक और चिंतित होना स्वाभाविक था। मैं अनुभव कर रहा था कि विभावरी के कष्ट बढ़ते जा रहे हैं। उसकी इस तरह की असहनीय पीड़ा मुझसे देखते नहीं बन रही थी। पलभर में चेहरा पीला हो जाता और पल भर में वह सामान्य हो जाता। मैंने शीघ्र ही सामने दिखाई पड़ रहे अस्पताल के बाहर टैक्सी को रुकवा दिया।
मेरे ध्यान को संध्या ने तोड़ा, 'बाबूजी कहां खो गए थे ?'

'अरे बहू तुम चाय ले आई।'

'जी हां, पता नहीं आप कहां मग्न थे।'

'बहू इस उम्र में अतीत की याद ही है, जो शेष रहती है।' मैंने ठंडी सांस लेते हुए कहा।

'बाबूजी मुझे मालूम है आपने कड़ा परिश्रम किया है, तब कहीं आज यह परिवार स्थायित्व पा सका है।

'सच कहती हो बहू, कभी-कभी समय के धारों में लगता है, समूल व्यक्तित्व ही बह जाएगा और कभी-कभी लगता है इतने आंधी-तूफान के बाद भी हम कैसे जीवित रहकर अपने अस्तित्व को बनाए हुए हैं। सच बहू, ईश्वर बहुत बड़ी परिक्षाएं लेता है।' मैंने कहा।

'बाबूजी, जो इन परीक्षाओं से जूझकर आगे बढ़ जाए वह अंतिम लक्ष्य तक पहुच सकता है।' संध्या ने कहा।

'ठीक कह रही हो..., चलो चाय पी लें, वह ठंडी हो रही है।'

'जी बाबूजी ।' कहकर हम दोनों ने चाय पी। हमारे मध्य गहरा सन्नाटा व्याप्त था, चाय पीकर बहू ने कप-प्लेट उठाई और अन्दर जाने को मुडी तो मैंने कहा, 'संध्या बेटी, एक बात कहूं तो मानोगी ना।

'कहिए बाबूजी ।' जाते-जाते संध्या ने रुककर कहा।

'बेटी, ऐसी अवस्था में अधिक काम मत किया करो।'

'जी बाबूजी ।' कहकर संध्या अंदर चली गई।

धूप थोड़ी तेज हो चुकी थी, मैंने कुर्सी खींचकर शहतूत के नीचे कर ली। थोडी सी धूप, थोड़ी सी छांव, ठीक जीवन की अनबूझ पहेली जैसी प्रतीत हो रही थी। कभी थोड़ा सा दुःख, कभी थोड़ी सी प्रसन्नता । जीवन संघर्षो को जीने का ही तो नाम है, मैं मन ही मन विचार कर रहा था। अतीत की छोड़ी गई कड़ियॉं पुनः मुझे याद आने लगी थीं।

पत्नी को चिकित्सालय में भर्ती किया और मैंने गांव तुरन्त समाचार भेज दिया कि मैं अमुक चिकित्सालय में हूं, विभावरी भर्ती है।

सात-आठ घंटे बाद डॉक्टर ने मुझे सूचना दी कि मैं पिता बन गया हूं। मन प्रसन्नता से पागल हो गया, हृदय ने चाहा दौड़कर अभी बच्चे को देख लूं, किन्तु डॉक्टर ने बताया कि 'मरीज को लाने में थोडा विलम्ब होने से बच्चे की स्थिती कोख में उल्टी हो गई थी और वह उलझ गया था, जिससे ऑपरेशन करके प्रसव करना पड़ा है। इस प्रसव के बाद आपकी पत्नी पुनः कभी गर्भवती नहीं हो सकेगी... बच्चा अभी कमजोर है, इसलिए 7-8 दिनों तक यहीं रुकना आवश्यक है, बच्चे से थोड़ा दूर रहना होगा।'

मैं विचार नहीं कर पा रहा था कि मुन्ना होने पर प्रसन्नता प्रकट करूं अथवा विभावरी के पुनः मां नहीं बनने पर दुःख प्रकट करूं ? लेकिन वर्तमान में जो ईश्वर ने मुझे प्रसन्नता दी है, उसके लिए तो मुझे उसका आभारी होना चाहिए..., सोचते हुए मैं तेजी से मुन्ना और विभावरी को देखने के लिए वार्ड की ओर बढ़ गया। नन्हे बालक का देखा, विभावरी को देखा। वह शांति से लेटी हुई थी।

मैं कुछ समय ठहर कर कमरे से बाहर बैठ गया। थोडी देर में गांव से मां और बाबूजी भी आ गए थे। वह भी मुन्ना को देखकर प्रसन्न हो उठे थे, किन्तु डॉक्टर के निर्देश के कारण एक बार भी उसे गोद में नहीं ले पाए थे।

दो-तीन दिन में मुन्ने का स्वास्थ्य सामान्य होने लगा था और एक-दो दिनों में हम छुट्टी लेकर घर आने वाले थे। वह तारीख आज की ही तारीख थी, जब मैं मां-बाबूजी के साथ अस्पताल पहुंचा, तो विभावरी रो रही थी। पालना खाली पडा था। मैं बुरी तरह से घबरा उठा। विभावरी ने बताया कि एक नर्स बच्चे को चेकअप के लिए ले गई। काफी देर बाद भी नर्स बच्चे के साथ नहीं लौटी, तो मैंने पुनः पूछा। मुझे बताया गया कि 'कोई चेकअप था ही नहीं। बच्चा शायद कोई ले गया है।' यह सुनकर विभावरी पुनः जोर से रोने लगी। मैंने मां को विभावरी के पास छोड़ा और बाबूजी के साथ डॉक्टर से मिलने गया। डॉक्टर ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी, लेकिन न तो काई गिरफ्तारी हुई और न ही मेरा पुत्र मुझे मिल सका।

विभावरी का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन खराब होता जा रहा था। मां-बाबूजी दस-बीस दिन रहकर गांव चले गए थे। पूरे घर में उदासी छा गई थी। एक तो विवाह के इतने वर्षों पश्चात पुत्र का जन्म हुआ और वह भी होते समय परेशानियों एवं उलझन के कारण अंतिम प्रसव बनकर रह गया था। दूर-दूर तक कहीं कोई आशा की किरण शेष नहीं बची थी। मैं एकांत के क्षणों में अपने आंसुओं को पीकर रह जाता था। कई संत, महात्माओं से मिले तथा मंदिर में मनौती मांगी, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। पूरे दो माह हो गए थे। विभावरी की ऐसी स्थिती मुझसे देखी नहीं जाती थी, कहीं जीवन की इस यात्रा में मुझे छोड़कर चली गई तो ?

एक दिन प्रातः जब पूरी तरह से उजाला भी नहीं फैला था कि दरवाजे पर मुझे एक बालक के रोने का स्वर सुनाई दिया, मैंने शीघ्रता से उठकर दरवाजा खोला। दो माह का बालक अस्पताल की चादर में लिपटा पड़ा रो रहा था। मैंने विभावरी को उठाया, उसे देखा, अरे यह तो हमारा ही मुन्ना है। ईश्वर ने हमारी खुशी को लौटा दिया था। एक पत्र भी मुन्ने के साथ रखा मिला था। लिखा था कि बच्चा ले जाने वाले को अपने किए कृत्य का काफी क्षोभ है, प्रायश्चित करना चाहता हूं इसलिए बालक को लौटा रहा हूं। कभी भविष्य में अचानक आकर क्षमा मांगू, तो क्षमा कर दीजिएगा। बच्चा पाकर हम इतने प्रसन्न थे कि हम इस पर विचार ही नहीं करना चाहते थे कि इसे कौन ले गया था और क्यों ले गया था ?

नन्हें बालक के घर में आ जाने के बाद घर में पूरी तरह से खुशियां लौट आई थी। विभावरी जो धीमे-धीमे निशा होती जा रही थी एक बार पुनः प्रातः की सुनहरी किरणों की तरह कुनकुनी हो गई थी। पुत्र का नाम हमने मनोज पूर्व में ही सोच रखा था और वहीं रखा भी। एक पल के लिए भी हम मनोज को आंखों से दूर नहीं रखते थे।

उम्र की नदियों से धीमे-धीमे पानी बहता रहा और अच्छी शिक्षा, अच्छे आदर्श के चलते मनोज एक अच्छे गुणों वाला पुत्र साबित हुआ।

दो वर्ष पूर्व ही उसका विवाह संध्या से हुआ था और आज मैं दादा बनने वाला हूं। समय कैसे बीतता चला जाता है, पता ही नहीं लगता।

जीवन-युद्ध में हम कई बार पराजित होने पर भी जीत का स्वांग रचते हैं। अपने स्वजनों से मिथ्या भाषण करते हैं, केवल इसलिए कि जीवन के सुखों के क्षण स्थाई हो जाएं। लेकिन झूठ, छल का पाप तो सदैव हृदय पर बोझ-सा बना ही रहता है। ऐसे ही एक पाप के बोझ को मैं उम्र के छठे दशक में भी भोग रहा हूं लेकिन किससे कहूं ?

तभी मुझे बाहर के दरवाजे से विभावरी आती दिखाई दी। हाथ में सब्जी का थैला था, थकी-थकी सी आकर मेरे पास रखी कुर्सी पर बैठ गई और कहने लगी, 'कभी-कभी तुम भी बाजार चले जाया करो।'

'ठीक है और कुछ आर्डर...।' मैंने कहा। उसने मेरे चेहरे को बडे ध्यान से देखा और कहने लगी, 'आज तुम्हारे चेहरे पर काफी चिंताएं और परेशानियां घुली हुई दिखाई दे रही हैं।'

'नहीं तो ?' मैंने निगाह नीची करते हुए कहा।

'तुम्हारी पत्नी हूं, इतने वर्षों से साथ हूं। कुछ छिप सकता है क्या मुझसे ?'
मुझे लगा मानो चोरी पकड़ी गई हो। मैंने स्वयं को थोड़ा संयत करके कहा, 'तुम्हारे मेरे रिश्तों में आज तक कोई छिपाव-दुराव नहीं था, लेकिन एक झूठ के पाप को मैं आज तक घसीट रहा हूं।' मैंने भरे गले से कहा ।

'कैसा झूठ। कैसा पाप ? तुम कैसी पहेलियां बुझा रहे हो ?' विभा ने तनिक आश्चर्य से पूछा।
हां, विभा एक सच, जो मैंने आज तक तुम्हें नहीं बताया है।'

'कैसा सच ?'

'सोचता हूं जीवन के अंतिम दिनों में यदि अपनी आत्मा पर यह वजन लेकर जाऊंगा, तो मुझे मुक्ति नहीं मिलेंगी।'

'कैसी बातें करते हो ?' नाराजी से विभा ने कहा।

'सच कह रहा हूं, मुझे तुम क्षमा कर सकोगी, तो ही मैं तुम्हें बता सकूंगा।'

'कहो भी... पति-पत्नी के रिश्तों में क्षमा, गलती, पाप भला कहां से आ गए।' विभा ने कहा।

'फिर भी तुमसे वचन चाहता हूं।' कहते-कहते अत्यधिक भावुकता में मैंने उसके हाथों पर अपने हाथों को रख दिया दिया।

'वचन देती हूं तुम से नाराज नहीं होऊंगी।' विभा ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा।

'विभा जो कुछ मैंने किया घर की सुख-शांति के लिए किया। मुन्ना की चोरी हो जाने के बाद तुम्हारा स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन खराब होता जा रहा था, तुमसे अलग जीवन जीने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। तभी मैं अपने मित्र से मिला और तुम्हारी स्थिति से अवगत कराया और हमने अनाथ आश्रम से एक दो माह के बालक को गोद ले लिया। मेरा वही दोस्त बालक को दरवाजे पर रखकर गया था और पत्र भी उसने लिखा था। तुम्हें चाहकर भी मैं नहीं बता सका था, विभा । किन्तु मन से आज पाप का यह बोझ हट गया है, तुम मुझे माफ कर दो...' कहते कहते आंखें भर आई थीं। विभा ने मेरे आसुओं को पोंछा और कहा, 'अरे ! इसमें इतना दुखी होने की बात क्या है ! यह सब तुमने मेरे लिए ही तो किया। मेरे मन में तुम्हारे प्रति श्रद्धा पहले से और भी अधिक बढ़ गई है।'

-डॉ. गोपाल नारायण

सरल विचार

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