बात उन दिनों की है जब महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि अब एक श्मशान समान निस्तब्ध पड़ी थी। चारों ओर बिखरे थे योद्धाओं के फटे वस्त्र, टूटे रथों के पहिए, चूर्णित शस्त्र, बिखरे मुकुट और आभूषण। वायुमंडल में व्याप्त थी मृत्यु की गंध और मौन की करुण पुकार। गिद्ध, सियार और कुत्तों की हृदयविदारक आवाजें उस भूमि के भयावह सन्नाटे को और गहरा रही थीं।
उसी भूमि पर, शर–शय्या पर पड़े देवव्रत भीष्म सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अकेले, किंतु शांति और स्वीकृति से भरे हुए।
तभी उनके कानों में एक मधुर, परिचित स्वर गूंजा -
“प्रणाम पितामह।”
भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मृदुल मुस्कान तैर उठी।
बोले - “आओ देवकीनंदन, स्वागत है तुम्हारा। मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था।”
कृष्ण ने झुककर प्रणाम किया और बोले -
“क्या कहूँ पितामह! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि आप कैसे हैं...”
भीष्म मौन रहे। फिर धीमे स्वर में बोले -
“क्या पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो गया, केशव? अब उनका ध्यान रखना। बुजुर्गों से रिक्त उस राजप्रासाद में उन्हें सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता होगी।”
कृष्ण शांत रहे।
कुछ क्षण बाद भीष्म बोले -
“कुछ पूछूँ केशव? बड़े शुभ समय पर आये हो। संभवतः इस धरा को छोड़ने से पहले मेरे कई भ्रम मिट जाएँ।”
कृष्ण ने कहा - “कहिए पितामह।”
भीष्म ने गम्भीर स्वर में पूछा -
“एक बात बताओ प्रभु, तुम तो ईश्वर हो न?”
कृष्ण मुस्कराए और बीच में ही बोले -
“नहीं पितामह, मैं ईश्वर नहीं। मैं तो आपका पौत्र हूँ, ईश्वर नहीं।”
भीष्म उस पीड़ा में भी हँस पड़े। बोले -
“जीवन भर अपने कर्मों का मूल्य नहीं आँक सका, कन्हैया! अच्छा रहा या बुरा, नहीं जानता। पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ, अब तो ठगना छोड़ दे रे...”
कृष्ण धीरे से निकट आए, उनका हाथ थामा और बोले -
“कहिए पितामह।”
भीष्म ने पूछा -
“कन्हैया! इस युद्ध में जो हुआ, क्या वह उचित था?”
कृष्ण ने कहा -
“किसकी ओर से, पितामह? पांडवों की ओर से?”
भीष्म बोले -
“कौरवों के कर्मों पर तो अब चर्चा का कोई अर्थ नहीं। पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ, वह उचित था?
आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ छल, निहत्थे कर्ण का वध - क्या यह सब धर्म था, केशव?”
कृष्ण बोले -
“इसका उत्तर मैं कैसे दूँ पितामह? इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया - भीम, अर्जुन... मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं।”
भीष्म हँसकर बोले -
“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे, कृष्ण? जग कहे कि यह युद्ध पांडवों ने जीता, पर मैं जानता हूँ - यह तुम्हारी विजय है। उत्तर तो तुम्हें ही देना होगा।”
कृष्ण गंभीर हो उठे -
“तो सुनिए पितामह, कुछ भी बुरा नहीं हुआ। वही हुआ जो होना आवश्यक था।”
भीष्म ने कहा -
“यह तुम कह रहे हो, केशव? वही कृष्ण, जिसे त्रेता का रामावतार कहा जाता है? छल तो कभी हमारे धर्म का अंग नहीं रहा। यह उचित कैसे हुआ?”
कृष्ण बोले -
“इतिहास से शिक्षा ली जाती है, पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
हर युग अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अपना नायक चुनता है।
राम त्रेता के नायक थे, मैं द्वापर का हूँ। दोनों के निर्णय एक से नहीं हो सकते।”
भीष्म बोले -
“स्पष्ट करो कृष्ण, मैं नहीं समझ पाया।”
कृष्ण बोले -
“राम और मेरे युग में बहुत अंतर है पितामह।
राम के युग में खलनायक भी शिवभक्त रावण होता था।
रावण के कुल में विभीषण और कुम्भकर्ण जैसे संत भी थे।
बाली के परिवार में तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसा धर्मपरायण पुत्र था।
उस युग में अधर्मी भी धर्म का ज्ञान रखता था।
इसलिए राम ने किसी के साथ छल नहीं किया।
पर मेरे युग में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे पापी जन्मे।
उनके विनाश के लिए छल भी धर्म बन गया, क्योंकि पाप का अंत ही परम धर्म है, चाहे वह किसी भी विधि से हो।”
भीष्म ने पूछा -
“पर केशव! क्या तुम्हारे इन निर्णयों से आने वाला भविष्य भ्रमित नहीं होगा?
क्या लोग तुम्हारे इन कर्मों को धर्म मानकर अनैतिकता को उचित नहीं ठहराएँगे?”
कृष्ण बोले -
“भविष्य तो इससे भी कठिन होगा, पितामह।
कलियुग आने वाला है, जहाँ मनुष्य को धर्म की रक्षा के लिए कृष्ण से भी कठोर होना पड़ेगा।
जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म के विनाश के लिए आक्रमण करती हैं, तब केवल नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है।
तब महत्वपूर्ण होती है विजय, केवल विजय।”
भीष्म ने पूछा -
“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव?”
कृष्ण बोले -
“धर्म का नाश नहीं होता पितामह, पर यदि मनुष्य निष्क्रिय हो जाए तो धर्म अवश्य क्षीण हो जाता है।
सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ देना मूर्खता है।
ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता, सब मनुष्य के माध्यम से होता है।
आप मुझे ईश्वर कहते हैं, पर बताइए, इस युद्ध में मैंने क्या किया? सब तो पांडवों ने ही किया न?
यही प्रकृति का नियम है - ईश्वर संकेत देता है, कर्म मनुष्य को ही करना होता है।”
भीष्म के चेहरे पर शांति उतर आई।
उनकी आँखें धीरे-धीरे मूँदने लगीं। बोले -
“चलो कृष्ण, यह धरती पर मेरी अंतिम रात्रि है।
कल शायद मैं चला जाऊँ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना।”
कृष्ण ने मौन होकर उन्हें प्रणाम किया और धीरे-धीरे युद्धभूमि की दिशा में बढ़ चले।
रात घोर थी, पर उस अंधकार में भविष्य का एक महान सूत्र जन्म ले चुका था -
“जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म के विनाश के लिए आक्रमण कर रही हों,
तब केवल नैतिकता का पालन आत्मघात होता है।
ऐसे समय में धर्म की रक्षा के लिए यदि छल भी आवश्यक हो, तो वही सच्चा धर्म है।”
“कभी-कभी सत्य की रक्षा के लिए झूठ भी पवित्र हो जाता है,
और धर्म की रक्षा के लिए छल भी अनिवार्य।”
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