भौतिक सफलता और अकेलापन...
पद, पैसा, प्रतिष्ठा, शोहरत पैरों में लोटती है,
हम भ्रम में हैं कि शिक्षा से इंसान समृद्ध होता है,
तो उच्च शिक्षितों के माँ-बाप वृद्धाश्रमों में क्यों पाए जाते हैं?
कोई डिप्रेशन का शिकार है, वह आत्महत्या कर लेता है।
जिसे समझते हैं सेलिब्रिटी, वह एकाकीपन में मरता है।
जिसने नाम कमाया, उसे आनंद क्यों नहीं मिलता?
क्या करेंगे इस बड़प्पन का, जब अपनों से ही नाता नहीं जुड़ता?
सादगी में सच्ची खुशी...
एक कड़वा सच बताता हूँ, आपको शायद विश्वास न हो,
गरीब, अनपढ़, ईमानदार मज़दूरों के माँ-बाप वृद्धाश्रम में नहीं मिलेंगे।
ऐसा नहीं कि उनके घरों में नहीं होते वाद-विवाद,
लेकिन तलाक और वृद्धाश्रम, उंगली पर गिने जाने लायक हैं अपवाद ।
बीमार माँ-बाप का इलाज, करते हैं सामान बेच-बेच कर,
फिर भी उस नातेदारी की डोर टूटी नहीं है आज तक।
गरीबी, व्यसन, गुस्सैल स्वभाव, फिर भी पत्नी निभाती जाती है,
कष्ट झेलकर भी हर हाल में साथ निभाती है।
दुःख हल्के हो जाते हैं एक-दूसरे से मिलकर,
एक बासी रोटी का टुकड़ा भी मिलकर खाते हैं सब बाँटकर।
जितना प्यार जताते हैं, उतना ही फ़ाड़़-फ़ाड़़कर बोलते हैं,
कितनी बार लड़ते हैं, पर अहंकार नहीं आता उनके बीच।
तकिए की जगह पत्थर रखकर भरी धूप में भी सो जाता है,
काली मिट्टी में पसीना बहाने वाला, वह किसान कहाँ नींद की गोली खाता है?
न धैर्य डगमगाता है न संयम, दुःख में भी संभलने की आस है,
क्योंकि इन इंसानों का आज भी इंसानियत पर विश्वास है।
आधुनिक विडंबनाएँ...
पर अब तो जमाना बदल गया है, इंस्टेंट रिज़ल्ट का दौर आ गया है,
अगर मन्नत पूरी न हो तो भगवान भी तुरंत बदला जाता है।
संयुक्त परिवारों (Joint Family) को, अब कौन अपनाना चाहता है?
बिना मतलब किसी के घर कौन जाना चाहता है?
जरा देखो अपने जीवन का नक्शा, न किसी का किसी से मेल है,
सब कहते हैं “जनरेशन गैप” बस यही अब खेल है।
किस पर दोष मढ़ें? विचार विकृत हो चले हैं,
घर, बंगला, फ्लैट सब हैं, पर दरवाज़ा किसी के लिए खुला नहीं है ।
'“बहुत अच्छा”, “बहुत खूब” सोशल मीडिया पर बहते हैं शब्द,
पर दिलों में सन्नाटा है, आभासी दुनियाँ में सब निर्जीव हैं अब।
मोबाइल पर शुभकामनाएँ, मोबाइल पर ही श्रद्धांजलि, सब कुछ स्क्रीन पर सीमित।
क्या सही? क्या गलत? अपनी राय रखने की भी हिम्मत नहीं,
वह बंद कमरे में मर गया, बदबू आने पर भी पड़ोसी को खबर नहीं ।
बच्चों को भेजा विदेश में, माँ के साथ बूढ़ा बाप कराहता है,
"अंतिम संस्कार निपटा लो, पैसे भेजता हूँ," अपना ही बेटा कहता है।
बेटे को पॉकेटमनी, बाइक, और भले ही दे दी हो कार,
कितना अच्छा होता, अगर दिए होते संस्कार?
हॉस्टल, बोर्डिंग में बचपन में ही भेज दिया, अब वह कैसे अपनापन दिखाएगा?
ज़मीन हो या जीवन, यहाँ जो बोया है, वही तो पाएगा।
जीवन का सच्चा गणित
जीवविज्ञान (Biology) सिखा दिया, जीवनशास्त्र (Philosophy of Life) सिखाओ!
अब कला गई भाड़ में, चरित्र को बचाओ।
त्रिभुज, वर्ग, षट्कोण सिखा दिए,पर जीवन-दृष्टि कौन देगा?
जिसके पास दृष्टिकोण नहीं, वह जीवन को कैसे जिएगा ?
विपरीत परिस्थिति में भी अपने सिद्धांतों को थामो,
व्याकरण से अधिक, हृदय की भाषा को जानो।
गलत हो जाए तो हो जाने दो अंकगणित और बीजगणित,
इंसानों को जोड़ो, गुण न सही पर गुणवत्ता तो भरो ।
संबंधों को सहेजो, गाँव, शहर, परिवार सब में,
मृत्यु पर कंधा देने वाले, चार जन हों मन के अपने।
मृत्यु पर दो आँसू ... यही जीवन की सच्ची कमाई है,
जिसने यह नहीं कमाया, वह जीवन जिया ही नहीं।
मिलजुलकर व्यवहार करें, खुशी से अच्छा जीवन जीएँ,
आप सब बड़े लोग हैं, अब हम क्या बताएं?
SARAL VICHAR
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Topics of Interest
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