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ममता, यादें और अधूरे रिश्ते | Emotional Kahani in Hindi


जाने वाले का फिर आना | JANE WALE KA FIR AANA | The Return Of The Departed In Hindi By Saral Vichar

बौराए आम के पेड़ वाले आंगन से आती खड़खड़ाहट की आवाजें। लगता है, अम्मा ने फिर आज बर्तन वाली बाई के लिए बर्तनों का ढेर लगा दिया और मन ही मन कुढ़ती बाई खुरच-पटककर काली कड़ाही साफ़ कर रही है। पास ही धनिए की पत्ती तोड़ती अम्मा से जब बाई का यह बर्तनी अत्याचार बर्दाश्त नहीं हुआ, तो वे बोल ही पड़ीं, 'अरे, क्या करती है! आहिस्ते से हाथ चला, कड़ाही मांजनी है, तोड़नी नहीं है!'

'तुम भी अम्मा ! आग पर बर्तन चढ़ाकर भूल जाती हो। देखो ! कैसी जलाई है तुमने यह कड़ाही ! और चार घरों के काम पड़े हैं। आधा बखत तो तुम्हारे घर के बर्तन रगड़ने में ही निकल जाता है।' बाई का भुनभुनाता प्रत्युतर था। अम्मा कुछ कह पातीं, इसके पहले सिगड़ी पर चढ़े कुकर ने सीटी बजाकर उन्हें बुला लिया। कुछ ही समय पश्चात रसोई से शांति और संधि की भावना से लबरेज, अपेक्षाकृत मदु आवाज आई, 'विमला ! चाय पिएगी क्या?'

गरम तासीर वाली चाय के प्रस्ताव का असर शीतल रहा। विमला बाई की सारी चिड़चिड़ाहट मद्धिम मुस्कान में तब्दील हो गई। धुले बर्तन रसोई में रखते हुए बोली, 'आज आपने अभी तक नहीं पी क्या?'

'अरे नहीं! वकील साहब के लिए जब बनाई थी, तब पी थी। अब तेरे लिए बना रही हूं, तो घूंट-दो घूंट मैं भी पी लूंगी।'

अम्मा अपनी चालीस साल पुरानी गृहस्थी के सर्वप्रथम व सबसे पुख्ता सबूत, अपने पति को वकील साहब कहकर पुकारती थीं। वकील साहब कितने पुराने व कितने सफल वकील थे, यह कहना संशयात्मक था, किंतु गिरते स्वास्थ्य या कहें बुढ़ापे की मार ने उनकी गर्दन और देह को थोड़ा झुका दिया था। लेकिन इतना सब होने के बाद भी वे अम्मा के 'ही मेन' थे।

उनके घर के पिछवाड़े वाले आंगन में आम, अमरूद व आंवले के पेड़ थे। ठंड की धूप अपनी समग्र लकदक के साथ अम्मा के आंगन में पसरी रहती। वहीं एक कोने में वे छोटा-सा चूल्हा जलाए वकील साहब के नहाने का पानी गरम करतीं। पति की तरह ही थोड़ी झुकी हुई कृशकाय अम्मा लगभग सफ़ेद हो गए बालों में अनवरत उनका साथ काले बालों वाले अतीत से निभाती चली आ रही थीं।

अम्मा तीज पूजतीं, तो चतुर्थी में भी उपासी रहतीं। ग्यारस में एक अन्न खातीं, तो पूर्णिमा पर चंद्र को अर्घ्य देना नहीं भूलतीं। वकील साहब को भोजन जिमाकर अम्मा के होंठ किसी चालीसा में रत हो बुदबुदाने लगते।

अकेले में भोजन करतीं अम्मा कभी-कभी विचारमग्न हो जातीं और अचानक थाली सरकाकर सुबकने लगतीं। शायद भोजन से जुड़ी विगत स्मृतियां उनके कलेजे में आकर अटक जातीं और स्मृतियों में बसा दुख उनकी आंखों से अश्रुधार बनकर टपकने लगता।

एकमात्र युवा पुत्र की असामयिक मृत्यु उनके इस दुख का कारण थी। अध्ययन में औसत रहे इस पुत्र का 'इसकी टोपी उसके सिर' वाला धंधा था। निम्न मध्यमवर्गीय अम्मा और वकील साहब बस इतना जानते थे कि वह किसी कपड़े की दुकान में काम करता है। लेकिन उसके धंधे 'ट्रिक' वाले होते थे, जिन्हें आपराधिक नहीं कहा जा सकता था। कम सुविधाओं वाला यह घर फिर भी ख़ुशियों की गुनगुनाहट से भरा रहता। आपण जब संतानसाते का उपवास करतीं, तो वकील साहब गुड़मींड़कर पुए बनाने में मदद करते और जब हरतालिका तीज पर पति के लिए निर्जला व्रत करतीं, तो बेटा बड़े मनोयोग से उनके गौरी-शिव के लिए फुलेरा बना देता।

कम में ही सही, तीनों से बनी यह छोटी-सी गृहस्थी मस्ती से चल रही थी। तभी इसमें एक विघ्न डल गया। बीती शाम से बेटा कुछ कांपता-सा नरम-गरम था। रात होते-होते उसे तीव्र ज्वर ने जकड़ लिया। देर रात शुरू हुईं उल्टियों ने अम्मा व बूढ़े वकील को किसी अनहोनी की आशंका से भर दिया। आधी रात को ही ऑटो में डाल लड़के को पास की डिस्पेन्सरी ले गए। नींद ख़राब होने से चिड़चिड़े डॉक्टर ने पता नहीं कौन-सा इंजेक्शन लगाया कि उसकी कांपती देह कुछ ही देर में काठ-सी हो गई। उसे हिलाते-डुलाते अम्मा और वकील साहब कुछ देर तो समझ ही नहीं पाए। फिर जब देह पर नीले-नीले निशान उभरने लगे, तो घिघियाते हुए वकील साहब ने कंपाउंडर से बेटे को बचाने की मिन्नत की। आए दिन की मौतें देखने का अभ्यस्त कंपाउंडर उठा और थोड़ी-बहुत जांच के पश्चात भावहीन स्वर में बोला, 'लड़का मर गया है, ले जाओ।'

लड़के का अंतिम संस्कार हुआ, लेकिन इसने मानो घर के सभी संस्कारों की इतिश्री कर दी थी। अब आंगन में चालीसा नहीं गूंजती थी, अम्मा की चूड़ियों में अब वह खनक शेष नहीं थी। वकील साहब और अम्मा साथ रहकर भी जैसे साथ नहीं थे। रोजमर्रा के बीच शायद ही कभी ऐसा होता हो कि पति-पत्नी नजर भरकर एक-दूसरे को देखते हों। आंवला नवमी पर मंगलगान गाती महिलाओं की टोली अब इस आंगन से बचकर निकल जाती थी।

एक दोपहर जब अम्मा अनमनी बैठी अनाज से भरे सूप में उंगलियां फिरा रही थीं कि तेज दस्तक हुई। दरवाजा खोला तो देखा, एक हृष्ट-पुष्ट देह वाला युवा था। अम्मा की आंखों में जब उसने ख़ुद के लिए अपरिचय का भाव देखा, तो बिना किसी औपचारिकता के थोड़े तेज स्वर में कहने लगा, 'देखो काकी, तुम्हारे लड़के ने हमाए से पंद्रह हजार रुपए उधार कह के लिए थे। महीना भर से तुम्हारे आदमी के चक्कर लगा रहे हैं कि हमार रकम वापस कर दो, लेकिन आज तारीख़ तक अठन्नी भी हमको वापस नहीं मिली। सो मजबूर होके आज हम घर पर आ धमके।'

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एक सांस में कितना कुछ अम्मा के कानों से आ टकराया। वे कुछ समझ पातीं इसके पहले आगंतुक का स्वर पुनः गूंजा, 'हमाए रुपे तुम्हारे लड़के ने लिए थे। हमें पता है कि वो मर गया है, इसलिए इतने दिनों से ग़म खाए थे। लेकिन अब ! अब हमाई भी गुंजाइश खतम हो गई है। बहन बैठी है घर में ब्याहने। उनकी भी बात पक्की-सी है। कल को हमें भी उसका दहेज जुटाना है।' अम्मा के चेहरे पर बेचारगी और विवशता के भाव उभर आए। इसने युवक के क्रोध पर नरमियत का छिड़काव कर दिया। उसने अपेक्षाकृत नर्म लहजे में रक़म की बात दोहराई और चला गया।

शाम में लौटने के बाद वकील साहब खूंटी पर काला कोट टांगने लगे, तब हाथ में पानी का गिलास लिए अम्मा ने दोपहर वाली घटना सुनाई।

वे बोले, 'दिवाली पर अखिलेश ने इस लड़के गजानन से पंद्रह हजार उधार लिए थे। अब वह अपने पैसे वापस चाहता है।

चिंतातुर अम्मा उनके पास आकर बैठ गईं। याद करते हुए बोलीं, 'अरे हां अखिलेश लाया तो था रुपए, लेकिन वो तो कहता था कि उसने मालिक से पेशगी लिए हैं।'

'उन रुपयों में से कुछ बचे हैं क्या?' वकील साहब का एक उम्मीद भरा प्रश्न था।


'कुछ पैसे तो व्रत-त्योहार में खरच हो गए और बाक़ी तुम्हारे भाई पुरुषोत्तम की लड़की के ब्याह में।


काफ़ी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय हुआ कि कुछ मासिक बचत करके ही इस ऋण से मुक्त हुआ जा सकता है।

उधार की उगाही के लिए गजानन अब समय-बेसमय आने लगा था। एक दोपहर वह पैसे लेकर जाने पर अड़ गया और कमरे में पड़ी खाट पर धरना देकर बैठ गया। जेठ की अलसाई दुपहरी का असर था या पिछले दिन के अतिरिक्त काम की थकान, जल्दी ही खरटि भरने लगा। जब सांझ को पंछियों की हलचल प्रारम्भ हुई, तब उसकी आंख खुली। रसोई में सामने अम्मा कड़ाही में कुछ टार रही थीं। सुबह का खाया हुआ शाम तक पच गया था और अब गजानन के पेट को कुछ भोज्य पदार्थ की दरकार थी। लेकिन कहे भी तो कैसे !

मां के मन का बच्चों के पेट से एक अदृश्य नाता होता है। गजानन खाट से उठकर जाता, इसके पहले अम्मा ने सूजी के हलवे और गरम पकौड़ों की प्लेट उसके सामने रख दी। चाय का प्याला भी था। तीव्र क्षुधा ने गजानन को ज़्यादा सोच-विचार का मौका नहीं दिया। पेट भरने के बाद ही वह खाट से उठा और 'काकी, जा रहा हूं' कहकर निकल गया। अम्मा के हृदय में एक संतोष था, वैसा ही जैसा अखिलेश के भोजन कर लेने के पश्चात होता था। वह शाम कुछ हल्की थी। रोज के अवसादी छींटों के स्थान पर महकते वात्सल्य की ख़ुशबू तैर रही थी।

गजानन का आना पूर्ववत जारी था, बस भाव बदल गए थे। अम्मा और गजानन एक अनदेखी स्नेह डोर से बंधते चले जा रहे थे। उधार का उल्लेख अब भी हो जाता था, लेकिन उगाही के सुर में नहीं, बल्कि अखिलेश की बात निकलने पर।

एक रोज अम्मा ने पंचांग उठाया। तिथियों पर फिसलतीं उनकी उंगलियां अचानक रुक गईं। लाल घेरे से घिरे ख़ाने में 'हलषष्ठी' लिखा था। 'कल हरछठ है ! अखिलेश के बाद की दूसरी हरछठ !' अम्मा के होंठ बुदबुदाए। उनका मन हुआ कि वे पुनः हरछठ उपवास करें, लेकिन दिमाग़ बेटे के न रहने पर व्रत की निरर्थकता बता रहा था।

अगले दिन सारे दिमाग़ी विश्लेषण को दरकिनार कर अम्मा ने मुंह अंधेरे ही स्नान कर लिया। एक हिचक-सी थी, फिर भी मन हल्का था, वात्सल्य से परिपूर्ण। संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए गुपचुप तरीके से रखे गए व्रत की पोल अम्मा की चूड़ियों की खनक खोल रही थीं।

वकील साहब को कोर्ट भेजने के बाद वे पूजा के लिए धूप, 'दीप, नेवैद्य खोजने लगीं। मन में कोई इच्छा घुमड़ रही थी कि सामने से गज की तरह ही डोलता, मुस्कुराता गजानन प्रत्यक्ष था, 'अरे काकी, क्या बात है, आज बड़े सबेरे ही नहा लिया !' सामने आंगन में आंवले के पेड़ के नीचे गीली मिट्टी के ढेर में कांस खुंची देखी, तो एक प्रश्न उसकी आंखों में उभर आया। अगले ही पल कुछ भांपकर वह सम्भला।

'अरे काकी, आज उपासी हो? पहले क्यों नहीं बताया !' कहते हुए गजानन बाहर निकल गया। कुछ देर बाद लौटा, तो हाथ में केले का एक बड़ा गुच्छा, खारिक, महुआ और व्रत में काम आने वाली चीजों के पैकेट थे। काकी ! काकी ! चिल्लाता गजानन अम्मा के समक्ष आ खड़ा हुआ।

वात्सल्य से सजल उनकी आंखें छलकना चाह रही थीं कि बग़ल के आंगन से समवेत स्वर में मंगल सोहर गूंजने लगे। अम्मा कहीं खो-सी गईं।

तभी गजानन का स्वर गूंजा, "अरे काकी, पूजा नहीं करनी क्या ? मुहूर्त बस दूसरे पहर का है।'

-अर्चना नेमा

सरल विचार

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