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बूढ़े पिता की तन्हाई और बेटे का मोह | Old Age Emotional Story


वृद्धाश्रम (कहानी) | VRADHASHRAM | OLD AGE HOME ( HINDI STORY)  - www.saralvichar.in


बड़ी देर तक रायसाहब खुशीराम की नजरें कोठरी की छत को घूरती रहीं। छत पर जगह-जगह पलस्तर के टुकड़े उतरे हुए थे। नंगी हो गई ईंटों और जंग लगे सरिए के टुकड़ों ने छत पर बड़ी विचित्र आकृतियां अंकित कर दी थीं। एक निशान हु-ब-हू राय साहब के बड़े बेटे धर्मवीर के चेहरे से मिलता था। रुपवान करता वही नाक, वही ठोड़ी, वही होंठों का कटाव। दूसरे निशान की रुपरेखा बिल्कुल उस अमरीकन स्त्री के चेहरे जैसी थी, जिसके साथ धर्मवीर ने विवाह किया था। एक अन्य निशान राय साहब के छोटे बेटे नरेश कुमार का चेहरा प्रकट करता था और दाहिने नुक्कड़ वाला चौथा निशान शायद नरेश कुमार की जर्मन पत्नी का चेहरा था। लेकिन यह अंतिम बात खुशीराम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता था, क्योंकि उसने अपनी छोटी बहू को आज तक नहीं देखा था।

हां, बड़ा बेटा धर्मवीर अपनी पत्नी समेत दिल्ली का एक चक्कर लगा गया था। किंतु वह उनके घर न ठहरकर एक होटल में ठहरे थे। खुशीराम और उसकी घरवाली होटल में ही अपनी बड़ी बहू के दर्शन कर आए थे। धर्मवीर से वह बालिश्त भर ऊंची ही थी। धर्मवीर का सिर उसके कंधे को ही स्पर्श करता था।

जंग लगे सरिए और ईंटों के इन कठोर चेहरों से नजर घुमाने के लिए खुशीराम ने करवट बदलनी चाही। पक्षाघातग्रस्त ( लकवा) शरीर से करवट लेना वैतरणी (नदी) पार करने के समान था। इस प्रकार अपंग होकर जीना भी कोई जीना था? क्यों न पलस्तर का एक टुकड़ा छत से उसके सिर पर गिरे और जिंदगी की कसैली यादों का सदा के लिए अंत कर दे। 

छत से नजर हटकर उनकी नजर खिड़की की चौखट पर गई, जिसको दीमक ने खोखला करके चिकनी मिट्टी से पोत दिया था। वृद्धाश्रम की इमारत भी अपने वासियों की तरह दिन-प्रतिदिन खस्ताहाली का नमूना बनती जा रही थी। सुनने में आया था कि यह इमारत सेठ ईश्वर दयाल महाजन की हवेली हुआ करती थी। सेठजी ने सेठानी की मौत के बाद इस हवेली को छोड़कर बाकी सारी जायदाद अपने बेटों में बांट दी थी। मन की शांति के लिए उसने मौत से पहले ही अपनी हिस्से की जमीन, सोनीपत का कोल्ड स्टोरेज और रोहतक का सिनेमा अपने बेटों को सौंप दिया। लेकिन अपने हाथ काटकर देने के बाद मन की शांति उसे बिल्कुल तिलांजली दे गई। सब कुछ संभाल लेने के बाद बहू-बेटों ने न केवल उनकी कुशलता ही पूछी बल्कि उसके साथ वह सलूक किया जो खुजली वाले कुत्ते के साथ किया जाता है। तब सेठ ने यह हवेली दान कर दी, ताकि उसके जैसे दुत्कारे गए लोगों के लिए एक वृद्धाश्रम खोली जा सके। सेठ ईश्वर दयाल महाजन इस वृद्धाश्रम के सबसे पहले वृद्ध थे। 

दीमक देखकर खुशीराम को कुछ होने लगता था।लेकिन दीमक खाई चौखट से खुशीराम ने आंखें न उठाई। दीमक से कोई छुटकारा नहीं था। वह जानता था कि किसी दिन यह दीमक खिड़की की चौखट से सरकती-सरकती उसकी चारपाई को आ लगेगी और फिर वह घड़ी दूर नहीं रह जाएगी, जब यह दीमक हरल-हरल करती उसके बूढ़े हाड़-मांस को भी चट कर जाएगी।

कोठरी के बाहर बरामदे में किसी के आने की भनक हुई। यह भनक खुशीराम पहचानता था। यह उसका जिगरी यार नंदसिंह था जो चार कोठरियां छोड़कर सत्रह नंबर की कोठरी में रहता था, जो उसके साथ दो शरीर, एक प्राण हो गया था। वृद्धाश्रम के सारे वासियों में से वे दोनों एक-दूसरे के सबसे अधिक निकट आए थे और बीती जिंदगी के सुख-दुःख उन्होंने एक- दूसरे के साथ बांटे थे। दोनों जिला गुजरांवाला के रहने वाले थे। दोनों के गांव में आठ कोस का फासला था।

नंदसिंह के गांव पर हमला हुआ था तो उसके गर्दन पर गंडासे से जख्म हुआ था। उस गंडासे के जख्म के कारण उसका शरीर कंपकंपाता था । इतना कुछ सहने के बाद भी वह हंस सकता था, लम्बा सुर लगाकर गा सकता था ।

'आज कोई बात सुनाओ नंदसिंह। आज सुबह से ही मेरा जी ठीक नहीं।'

'कहो तो कोई विष्णु-पद्य सुनाऊं ।'

'नहीं, आज तुम्हारे गांव मुगल-चक की बात सुनाओ ।

'अच्छा फिर मुगल-चक की ही बात सुनो। जुम्मां मीरासी की बात तो नहीं सुनाई पहले तुम्हें?' नंदसिह के मुख से बात आठ-दस बार सुनकर भी बासी नहीं होती थी। जुम्मा-मीरांसी की बात वह पहले कई बार सुना चुका था, फिर भी खुशीराम ने नहीं में सिर हिला दिया।

एक था जुम्मां-मीरांसी हमारे गांव का । लेकिन बहुत मक्कार। मिरासिन तो बिल्कुल अल्लाह मियां की गाय थी। लेकिन जुम्मा... कुछ न पूछो। एक रात जुम्मा और मिरासिन छत पर सोए हुए थे। तभी एक चोर पड़ोसियों की छत लांघकर आ गया। छत लांघने की ध्वनि सुनकर जुम्मे ने करवट बदली। उसकी नींद तो महीनाभर पुरानी बलगमी खांसी ने कम कर दी थी। जुम्मे के करवट बदलने पर चोर झट मिरासिन की चारपाई के नीचे सरक गया। जुम्मे ने मुख में बलगम इकट्ठी करके अंजुली-अंजुली जितने खंखार मिरासिन की चारपाई तले फेंकने लगा। चोर बड़ी मुश्किल में फंसा हुआ था। न हिलने के योग्य था, न बोलने के योग्य । बस सारी रात जुम्मा, चोर को खंखारों से लीपता रहा। जब सुबह होने को थी तो चोर चारपाई से निकलकर मुंडेर पर गली में छलांग मारने लगा तो जुम्मां बोला, 'यजमानजी, तसल्ली कर लेना कोई जगह सूखी तो नहीं रह गई।'

रायसाहब खुशीराम के मुख पर एक क्षीण-सी मुस्कान आ गई। नंदसिंह जानता था कि किसी हंसी या ठहाके की आशा खुशीराम से रखनी निराधार थी। यह क्षीण मुस्कान ही उसकी खुशी की अभिव्यक्ति की सीमा थी। नंदसिंह को इस क्षीण मुस्कान से ही अपना पूरा मेहनताना मिल जाया करता था।

बाहर आश्रम के दालान में एक मोटर रुकने की आवाज आई। नंदसिंह ने घूमकर खिड़की के बाहर देखा । एक गोरा सफेद नौजवान हाथ में गुलदस्ता उठाए टैक्सी से उतर रहा था, और अगले ही क्षण वह नौजवान कोठरी के अंदर आ घुसा ।

'Well Grand Pa' उसने खुशीराम को गुलदस्ता पेश करते हुए कहा, 'I am Rajesh from California।'

इतनी सी अंग्रेजी नंदसिह भी समझता था । वह धीरे से लोहे के स्टूल से उठा और बाहर सरक गया ।

अभी दस मिनट भी नहीं बीते थे, अभी नंदसिंह ने टैक्सी की दो-चार परिक्रमाएं ही की थी, अभी टैक्सी ड्राईवर के साथ उसके वार्तालाप में प्रवाह भी नहीं आया था, अभी वह सोच रहा था कि वह टैक्सी ड्राईवर को बिरजू इक्के वाले की बात सुनाए कि वह नौजवान टैक्सी में आ बैठा और फुर्र करके टैक्सी नजर से ओझल हो गई। तभी नंद सिंह को भ्रम सा हुआ कि क्या कोई टैक्सी सचमुच वृद्धाश्रम के अभिशप्त दालान में आ खड़ी हुई थी ?

लेकिन जब उसने राय साहब खुशीराम के सिरहाने गुलदस्ता पड़ा हुआ देखा तो उसका भ्रम टूट गया ।

गुलदस्ता उठाकर अपने करीब करते हुए बोला, 'फूल कितने सुंदर हैं, लेकिन कोई खुश्बू नहीं। या न जाने मुझे जुकाम लग गया हो।'    'नहीं नंदसिंह, यह विलायती फूल हैं। इनमें सिर्फ रंग होता है, खुश्बू नहीं होती ।'

'बड़ी जल्दी चला गया तुम्हारा पोता । दस मिनट भी नहीं लगाए उसने ?'  'हाँ कहता था- आज रात की फ्लाईट से वापस जाना है। एयरइंडिया के दफ्तर से बुकिंग कनफर्म करानी है।'

'अच्छा कहता तो होगा, चलो मेरे साथ अमरिका । कहां आश्रम में हड्डियां ख्वार कर रहे हो।' *

नहीं,' खुशीराम के मुख से अपने आप तब सच निकलता-निकलता रह गया और उसकी जीभ झूठ की ओर लड़खड़ा गई। 'हां, कहता था, इस बार टाईम नहीं मिला । अगली बार आऊंगा तो आपका पासपोर्ट और वीसा बनवा कर आपको साथ ले जाऊंगा।'

'शाबाश, भाई, पोते को ।' नंदसिंह ने कहा, 'दादा की इज्जत रख दिखाई है। धोने धो डाले हैं सब बहू-बेटों के।'

अचानक राय साहब खुशीराम को लगा, जैसे उसके अंदर रुदन भर गया हो। जिंदगी में कई बार झूठ बोला होगा, लेकिन इस जिगरी यार के सामने आज बोला गया यह झूठ उसके जमीर, उसकी आत्मा पर बोझ हो गुजरा और उसकी दहाड़ें निकल गईं। नंदसिंह ने चारपाई पर पड़े खुशीराम का शिथिल हाथ अपने दोनों हाथों में दबा लिया। उसी समय पलस्तर का एक टुकड़ा कोठरी की छत से गिरा । चौंक कर खुशीराम ने छत पर उखड़े पलस्तर के नए निशान की ओर देखा। यह तो उसके पोते राजेश का चेहरा था।

-महिंदर सिंह सरना

SARAL VICHAR

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