कई वर्षों तक कठोर व्रत, उपवास और मंत्र जाप करते हुए दोनों ने शिव को प्रसन्न किया। कहा जाता है कि मृकण्डु ऋषि ने ‘रुद्राष्टाध्यायी’ और ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का सहस्रों बार जप किया था। शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष दर्शन दिए।
वरदान और विकल्पभगवान शिव ने मृकण्डु ऋषि से कहा — “तुम्हें दो वरदानों में से एक चुनना होगा — या तो तुम्हें दीर्घायु लेकिन निर्बुद्धि पुत्र मिलेगा, या अल्पायु लेकिन महाबुद्धिमान और तपस्वी पुत्र।”
मृकण्डु ऋषि और मरुद्मति ने विचार किया कि कुल को तेजस्वी संतान ही गौरवान्वित करती है, भले ही वह थोड़े समय के लिए क्यों न आए। उन्होंने अल्पायु लेकिन महान तेजस्वी पुत्र का वरदान लिया।
मार्कण्डेय का जन्म और बाल्यकाल
कुछ समय बाद मरुद्मति ने एक दिव्य तेजस्वी बालक को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया मार्कण्डेय — इसका अर्थ है ‘मृकण्डु का पुत्र’। बचपन से ही मार्कण्डेय विलक्षण बुद्धि के थे। उन्होंने कम उम्र में ही वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन कर लिया। वे यज्ञ, तप और साधना में लीन रहते और विशेष रूप से भगवान शिव के अनन्य भक्त बने।
अल्पायु का रहस्य और महामृत्युंजय मंत्र
जैसे-जैसे मार्कण्डेय की उम्र बढ़ने लगी, उनके माता-पिता को चिंता सताने लगी। सोलहवें वर्ष के पास आते ही उनकी माता ने उन्हें उनके भाग्य का रहस्य बता दिया। यह सुनकर मार्कण्डेय विचलित नहीं हुए। उन्होंने कहा, “यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो मुझे कोई मृत्यु नहीं छू सकती।”
उन्होंने गंगा तट पर एकांत में शिवलिंग स्थापित किया और महामृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान प्रारंभ कर दिया।
महामृत्युंजय मंत्र:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
कहते हैं यह मंत्र स्वयं ब्रह्मा से सप्तर्षियों को प्राप्त हुआ था और मार्कण्डेय ने उसे ब्रह्मर्षि अंगिरा से सीखा था।
यमराज का आगमन और शिव प्रकट
निर्धारित समय पर यमराज अपने गणों के साथ मार्कण्डेय के प्राण लेने आए। पर मार्कण्डेय तो शिवलिंग से लिपटे महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रहे थे। यमराज ने जब अपना पाश फेंका तो वह सीधे मार्कण्डेय के गले में पड़ते हुए शिवलिंग को भी छू गया। इसी से भगवान शिव कुपित हुए।
शिवजी ने शिवलिंग से प्रकट होकर कहा — “हे यम! यह मेरा परम भक्त है। इसकी मृत्यु असंभव है।”
शिवजी ने क्रोध में आकर यमराज पर त्रिशूल चला दिया। यमराज मूर्छित होकर गिर पड़े। देवताओं ने भयभीत होकर शिवजी की स्तुति की और प्रार्थना की कि धर्मचक्र थम न जाए, अतः यमराज को पुनर्जीवित करें।
शिवजी ने यमराज को चेतन किया, लेकिन मार्कण्डेय को अमरत्व का वरदान दिया — “तुम सदा अमर रहोगे, काल भी तुम्हें छू नहीं सकेगा। तुम्हारा नाम युगों तक स्मरण किया जाएगा।”
मार्कण्डेय ऋषि की चिरंजीविता और योगदान
मार्कण्डेय ऋषि ने कालांतर में अनेक पुराणों की रचना में योगदान दिया। मार्कण्डेय पुराण इन्हीं के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें दुर्गा सप्तशती का वर्णन भी है।
कहा जाता है कि महाप्रलय के समय मार्कण्डेय ऋषि अकेले जीवित रह गए थे और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के रूप में बालक रूप धारी नारायण को अपनी गोद में देखा था। यह प्रसंग भागवत महापुराण में विस्तार से आता है।
मार्कण्डेय ऋषि हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति और तप से मृत्यु जैसी अटल चीज़ को भी जीता जा सकता है। उनका महामृत्युंजय मंत्र आज भी असाध्य रोगों और अकाल मृत्यु के भय को हरने के लिए लाखों श्रद्धालुओं द्वारा जपा जाता है।
SARAL VICHAR
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