जब हम दो भोजन के बीच आठ घंटे का उपवास रखते हैं, तो वह उपवास हमारे भीतर फिर से भूख की तैयारी करता है। यही भूख भोजन का वास्तविक स्वाद बनाती है। अगर कोई व्यक्ति दिनभर कुछ न कुछ खाता ही रहे, तो उसकी भूख मर जाती है, और उसके साथ ही भोजन का रस भी खत्म हो जाता है।
यह एक उलटबांसी-सी बात लग सकती है, पर यही जीवन का गहरा सत्य है, भोजन का आनंद भूख में है। जितनी गहराई से भूख लगती है, उतना ही गहराई से भोजन का स्वाद अनुभव होता है। और यह केवल भोजन तक सीमित नहीं, यह जीवन के हर स्तर पर लागू होता है।
जैसे भूख के बिना भोजन का आनंद नहीं, वैसे ही विचारों की परिपक्वता के बिना ध्यान की गहराई नहीं आती। जब तक तुम सोचते नहीं, भटकते नहीं, उलझते नहीं तब तक ध्यान की गहराई की आकांक्षा भी पैदा नहीं होती। ध्यान का रस विचारों की तपिश में पकता है।
उसी प्रकार, ब्रह्मचर्य की जड़ें भी कामवासना में छिपी होती हैं। यह भी सुनने में अटपटा लग सकता है, लेकिन अगर तुमने काम के अनुभव की आग में खुद को झोंका है, उसे पूरी तरह जाना है, उसकी सीमा तक पहुँचे हो तभी ब्रह्मचर्य का फूल खिलता है। वह repression (दमन) से नहीं, बल्कि transformation (परिवर्तन) से जन्मता है।
लेकिन अब तक जो भी तुम्हें सिखाया गया है, वह विभाजन पर आधारित रहा है। किसी ने कहा:
संसार और संन्यास एक-दूसरे के विरोधी हैं।
काम और ब्रह्मचर्य में टकराव है।
विचार और ध्यान अलग-अलग ध्रुव हैं।
इन शिक्षाओं ने हमारे भीतर संघर्ष, कलह और द्वंद्व भर दिया। उन्होंने जीवन को खंड-खंड कर दिया, एक युद्धभूमि बना दिया जहां हर इच्छा एक शत्रु है, और हर अनुभूति से भागना है।
पर मैं तुम्हें युद्ध नहीं, संवाद देना चाहता हूं। संघर्ष नहीं, समन्वय।
मैं चाहता हूं कि तुम्हारे भीतर संगीत बजने लगे, वह संगीत जिसमें जीवन की हर ध्वनि, हर तरंग, एक समवेत स्वर में गूंजने लगे। जिसमें शरीर और आत्मा, भोग और योग, विचार और शांति ... सब एकसाथ मिल जाएं, जैसे नदी समुद्र से मिलती है। कोई विरोध नहीं, केवल सामंजस्य।
इसलिए कबीर कहते हैं:
"वे ही विरले योगी हैं, जे धरनी महारस चाखा।"
वे ही सच्चे योगी हैं जिन्होंने परमात्मा को भी जाना और धरती को भी पूरी तरह जिया। केवल परमात्मा की खोज में लगे रहने वाले योगी अधूरे हैं और केवल धरती के भोग में डूबे हुए लोग भी अधूरे हैं।
पूर्ण वही है जिसने आत्मा का भी रस चखा और शरीर का भी, जिसने ध्यान को भी अनुभव किया और प्रेम को भी, जिसने भीतर का भी द्वार खोला और बाहर की सुंदरता को भी गले लगाया।
वही विरले योगी दुनिया को वह शांति दे सकते हैं जो पूरब जानता है और वह सुख दे सकते हैं जो पश्चिम खोजता रहा है।
और जहां शांति और सुख का संतुलन बैठता है, वहीं जन्म होता है संयम का।
संयम का अर्थ त्याग नहीं है, repress करना नहीं है। संयम का अर्थ है संतुलन।
जहां तुम अति से बचते हो, जहां तुम जीवन के हर रस को उसकी मर्यादा में पीते हो, जहां तुम भीतर और बाहर को जोड़ते हो, तो संयम जन्म लेता है।
आज पूरब भी असंतुलन में है । ध्यान तो है, पर भोग की निंदा के साथ।
पश्चिम भी असंतुलन में है। सुख है, पर आत्मा का विस्मरण कर दिया गया है।
इसीलिए दोनों दुखी हैं।
दुख असंयम में है, और सुख संयम में।
संयम... यानी दोनों छोरों को जोड़े रखना, बीच की रेखा पर चलना। यही जीवन का महासुख है।
-OSHO
-सरल विचार
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Topics of Interest
life balance, संयम, mindfulness, ध्यान और भोग, self control, inner peace, spiritual growth, mental clarity, moderation, सुख और शांति, जीवन के रस, ब्रह्मचर्य और योग

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