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रेखाओं में कैद बाबूजी की यादें | Babuji Memories in Lines

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रेखाएं भी बोलती हैं, बहुत कुछ बोलती हैं। मेरी अलमारी में एक बहुत पुरानी फाइल है, जिसमें कुछ कागज एकदम सुरक्षित हैं। उन कागजों पर आड़ी-तिरछी रेखाएं हैं। कुछ स्केच हैं, अपने करीबी चेहरों के। ये स्केच मैंने बाबूजी से बनाने सीखे थे। कागजों पर उभरी रेखाएं मुझे बचपन की ओर खींच ले जाती हैं।

'बाबूजी, देखो मैंने चित्र बनाया है।' मेरे नन्हे हाथ एक कागज उनकी तरफ बढ़ा देते हैं।


'वाह, मेरी बेटी ने तो बहुत प्यारा चित्र बनाया है।' बाबूजी के चश्मे के भीतर से झांकती आंखें मुस्कुराने लगती हैं। वे मुझे गोद में लेकर पूछते हैं, 'अच्छा बताओ तो मेरी गुड़िया बड़े होकर किसका चित्र बनाएगी?'


'आपका', मैं झट से बोल उठती। बाबूजी स्नेह से मेरा हाथ सहलाकर मेरे गालों को चूम लेते हैं। ये सबकुछ जैसे कल ही बात लगती है।


मैं चार साल की थी, जब मेरी मां चल बसी थी। मुझसे छह साल बड़े आलोक दादा और चार साल बड़े पन्ने दादा ने मां के दुलार को, उसके चेहरे को महसूस किया था लेकिन मैंने अपनी मां के चेहरे को बाबूजी के द्वारा बनाए चित्रों में ही जाना था। कैनवास और रंग, यही एक चित्रकार का जीवन होते हैं। दिनभर ऑफिस में काम करने के बाद शाम को यही कैनवास और रंग उनकी थकान दूर करने का एकमात्र साधन बनते। बाबूजी चाहते तो दूसरी शादी कर सकते थे, लेकिन वो हमारे लिए दूसरी मां नहीं लाना चाहते थे।


'अनु क्या कर रही हो?' सहसा निखिल के शब्द मेरे कानों पर पड़े। मैंने पलटकर देखा तो निखिल खड़े थे। मैं जब भी बाबूजी की यादों में उदास होती हूं, तो निखिल भी मेरे साथ उदास हो जाते हैं। निखिल को देखते ही मेरी पीड़ा आंसुओं में ढल गई और मैं बच्चों की तरह रोने लगी। 'निखिल बाबूजी कहां चले गए?' मैं अवरुद्ध कंठ से कहती हूं।


'अनु, बाबूजी जहां होंगे, अच्छी तरह होंगे। तुम परेशान मत हो ..

पर ऐसा भी कहीं होता है, कोई अपना घर छोड़कर चला जाए और वापस न आए।' मैंने कहा।


मुझे बार-बार बाबूजी का चेहरा याद आ रहा था। क्यों किया ऐसा बाबूजी ने? क्यों बड़ी भाभी से झगड़ा होने पर अपना घर छोड़कर चले गए? वह घर, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के पैंसठ साल गुजार दिए, उसे एक झटके में छोड़ दिया। वे रिश्ते-नाते, जिन्हें वे अब तक निभाते रहे, उन्हें अचानक विस्मृत कर दिया। उन्हें घर छोड़े हुए आठ साल हो गए। इस उम्र में जब उन्हें संरक्षण और सहारे की जरूरत थी, तब वे बेघर भटक रहे होंगे। बाबूजी मैं आपकी पीड़ा अच्छी तरह जानती हूं। बड़ी भाभी की कोई बात आपके अंतर्मन को गहराई तक कचोट गई होगी और आप सह नहीं पाए होंगे।


कभी-कभी मन करता है कि मैं जोर-जोर से चीखूं-चिल्लाऊं, घर की ये दीवारें शायद मेरा दर्द बांट लें। इन दीवारों ने तो रोज मुझे बाबूजी की याद में तिल-तिलकर जलते देखा है। कैसे भुला दूं उस शख्स को, जिसकी उंगली पकड़कर मैंने चलना सीखा.. कैसे भुला दूं उस वात्सल्य को, जिसमें ममता की छांव का भी अहसास जीता रहा। 'अनु जरा दरवाज़ा तो खोलना, शायद बाहर कोई दस्तक दे रहा है।' निखिल के स्वर से जैसे मैं नींद से जागी।


दरवाजा खोला तो विस्मय से सामने खड़ी काया को देखती रह गई। एक दुपली-पतली काया, पिचका हुआ मुंह, चेहरे पर उगी हुई सफेद दाढ़ी-मूंछें, बिखरे-उजड़े बाल, एकदम पीला पड़ा चेहरा और हाथ में एक छोटा-सा थैला। यह वही काया थी, जो यादों में रह-रहकर मेरे मन में दस्तक देती रहती थी। 'बाबूजी आप!' यह कहकर मैं उनसे लिपट गई और स्वयं को रोक नहीं पाई, उलाहना देते हुए बोली, 'कहां चले गए थे आप हम सबको छोड़कर।' ऐसे अवसर पर आंसुओं का बांध तो टूटना ही था, सो ऐसा टूटा कि निखिल घबराकर बाहर आ गए।


'अनु बेटे, अपने आपको सम्भालो।' बाबूजी मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले थे। उनके हाथ कांप रहे थे।


'बाबूजी, ये क्या हाल बना लिया है आपने?' बाबूजी की ऐसी दशा देखकर निखिल का गला भी भर आया था। 'क्या मैं आपका बेटा नहीं, आप यहां क्यों नहीं चले आए, क्यों अकेले इस तरह भटकते रहे?'

निखिल का स्वर डूबता जा रहा था। बाबूजी शांत थे, कुछ बोल नहीं रहे थे, पर उनकी गीली आंखें, सूखे होंठ, चेहरे पर उभरी हुई झुर्रियां उनके दर्द की स्वतः अभिव्यक्ति दे रही थीं।


'मैं एक गिलास पानी पिऊंगा।' वह थके स्वर में बोले। मैं उनके लिए पानी ले आई। वह गटगट पी गए, मानो बहुत प्यासे हों। हां! बहुत प्यासे ही रहे होंगे, इतने दिनों से अपने घर से दूर भटककर जी रहे थे और भटकाव में शांति कहां मिलती है। जब व्यक्ति थक जाता है, तो प्यास लगती है। बाबूजी की यह थकान शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की थी। उनका दिल उस दरिया के पानी की तरह लग रहा था, जो दरिया में उथल-पुथल हो जाने से किनारों को तोड़ता हुआ बहुत आगे बढ़ गया था, लेकिन अब लौटकर शांत हो जाने की दशा को प्राप्त कर लेना चाहता था।


'जानती हो अनु, मैं तुम्हारे पास क्यों आया हूं? एक दिन बाबूजी ने मुझसे पूछा। मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी तरफ देखा। वह भी मेरी तरफ एकटक देख रहे थे। फिर दूसरी ओर मुंह कर भराए स्वर में बोले, क्योंकि मैं एक लावारिस मौत नहीं मरना चाहता, अपनों के बीच मरना चाहता हूं।'


'बाबूजी, आप मरने की बात क्यों करते हैं, मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि हम लोगों के बगैर कौन-सा आप जी रहे थे।' मेरे आंसू फिर बह निकले।


बाबूजी मेरी तरफ मुड़े और अपनी उंगली की पोर से मेरे आंसू की एक बूंद को लेकर बोले, 'मेरे लिए ये आंसू नहीं, मोती हैं। मेरी प्यारी गुड़िया, इन मोतियों को व्यर्थ मत बहाया कर।' बचपन में भी वो मुझे कुछ इसी तरह चुप कराते थे..।


मैं अपनी तरफ से बाबूजी की जी-भरकर सेवा कर रही थी। एक दिन वे मुझसे कह भी उठे थे, 'तू तो मेरी ऐसे सेवा कर रही है, जैसे बेटी नहीं मेरी मां हो।' उनकी इस बात पर मैं हंस पड़ी थी। बाबूजी का ध्यान मैं बिलकुल एक बच्चे की तरह ही रख रही थी। बाबूजी भी तो इस उम्र में बचपन की तरफ लौट आए थे। वृद्धावस्था सम्भवतः पुनः बाल्यावस्था प्राप्त करने का ही नाम है। इस उम्र में बच्चों जैसी जिद, बच्चों जैसी लापरवाही और बच्चों जैसी सुरक्षा व प्यार पाने की लालसा जागृत हो उठती है। बूढ़े लोग बच्चों का प्यारभरा स्पर्श भी चाहते हैं, जो उन्हें मिल नहीं पाता क्योंकि बच्चे तब तक अपना संसार फैला चुके होते हैं।


'अनु, आज मैं जाना चाहता हूं।' नहा-धोकर पैजामा-कुर्ता पहने, आंखों पर मोटा चश्मा लगाए तथा कंधे पर अपना थैला लटकाए बाबूजी मेरे सामने खड़े थे।


'कहां?' मेरे मुंह से अनायास निकल गया। 'कहीं भी, पर बेटी के घर अब नहीं रुक सकता।'

उन्होंने जेब से निकालकर रुमाल में बंधे मां के कंगन मुझे दिए। 'इन्हें रख ले। इतने दिन मैं तेरे घर पर ठहरा, तेरा जो भी इस बूढ़े पर खर्च हुआ, वो इससे अदा हो जाएगा। एक बाप बेटी से कुछ ले भी कैसे सकता है?' अंतिम वाक्य वे मद्धिम स्वर में बोले थे।


'बाबूजी ये पुरानी बातें छोड़ दीजिए। अब बेटी-बेटे में कोई अंतर नहीं करता। आप आराम से यहां ठहरिए।' मैंने बाबूजी को हाथ पकड़कर उन्हें सोफे पर बैठा दिया। लेकिन वे तुरंत उठ खड़े हुए और बेचैन से कमरे में टहलने लगे। मां के कंगन फिर से मेरे हाथों में देते हुए बोले, 'इन्हें रख ले, मैं कोई बोझ रखकर नहीं जाना चाहता।'


'कहां जाएंगे?' मैंने पूछा।


'कहीं भी। दुनिया बहुत बड़ी है, मैं किसी आश्रम या मंदिर में रह लूंगा।' वह अधीर होकर बोले।


'बाबूजी, घर होते हुए आप आश्रम या मंदिर में रहेंगे।' मेरी रुलाई फूट पड़ी।


'अनु बेटे, मुझे जाना है और जाने वाले को कौन रोक सका है।' वो सोफे पर गुमसुम बैठ गए।


मेरा मन कर रहा था कि उनसे चीखकर कहूं, 'मैं रोकूंगी आपको, मेरा स्नेह, मेरे आंसू रोकेंगे आपको।' यथार्थ में मैं कुछ कह नहीं सकती थी, पर बचपन से बाबूजी से अपने लिए बेटी के स्थान पर बेटे का सम्बोधन सुनती आ रही हूं। आज बाबूजी इस सम्बोधन की सार्थकता को झुठला रहे हैं, तभी तो मेरे घर रुकना नहीं चाहते। क्यों नहीं टूट सकती वे परम्पराएं, जो एक पिता की सेवा करने से बेटी को रोकती हैं? अभी भी बाबूजी का गुस्सा, उनकी बेचैनी, उनके हाव-भाव से स्पष्ट झलक रही थी। 'बाबूजी, मत जाइए हम सबको छोड़कर।' उनके जिद्दी स्वभाव को जानते हुए भी मैं एक बार फिर उनसे कह उठी। उन्होंने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं, वह अपनी ही धुन में बड़बड़ा रहे थे, 'मैं इस संसार में फालतू हो गया हूं। अरे ऐसा नियम क्यों नहीं बन जाता कि व्यक्ति फालतू होते ही मर जाए। मैं तो कहता हूं कि साठ के बाद किसी को जीना भी नहीं चाहिए।'


बाबूजी का यह व्यवहार मुझे दुख पहुंचाने के साथ-साथ भय भी उत्पन्न कर रहा था। आखिर बाबूजी बार-बार मरने की बात क्यों कर रहे हैं? मैंने निखिल को दफ्तर में फोन किया कि वे तुरंत आ जाएं। निखिल ने मुझे आश्वासन दिया कि एक जरूरी मीटिंग में हैं। मीटिंग दो घंटे में खत्म हो जाएगी, तो वे घर आकर सबकुछ सम्भाल लेंगे।


फोन रखकर मैं कमरे मैं गई, तो देखा बाबूजी सोफे पर बैठे-बैठे सो गए थे। उनके मुख पर शांति झलक रही थी, थोड़ी देर पहले का उनका उद्वेलन विलुप्त हो चुका था। मेरा चित्रकार मन जाग उठा। मैं बुदबुदाई, 'कहां जाएंगे आप, मैं आपको रेखाओं में कैद कर लूंगी।' सारा काम छोड़कर मैं बाबूजी का चित्र बनाने लगी। बाबूजी का भोला-भाला चेहरा, उनकी भावमुद्रा इतनी अच्छी थी कि मैं बस चित्र बनाती जा रही थी। मुझे पता ही नहीं चला कि कब दो घंटे बीत गए। निखिल घर आए, तो मैंने उन्हें चुप रहने का संकेत दिया और उस कमरे में ले गई, जहां बाबूजी सो रहे थे। मैंने उनका चित्र बना लिया था, बस रंग भरना शेष था। हम दूसरे कमरे में आ गए। 'ये तो अच्छा हुआ कि बाबूजी सो गए वरना वह तो जाने के लिए एकदम तैयार खड़े थे। मैं तो घबरा गई थी।' मैंने निखिल से कहा।


'तुम जल्दी से जाकर चाय बनाओ। मैं बाबूजी को मना लूंगा, उन्हें कहीं नहीं जाने दूंगा।' मैं चाय लेकर आई, तो निखिल ने जगाने के उद्देश्य से बाबूजी के कंधे पर हाथ रखा, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जैसे ही निखिल ने उनके कंधे को हिलाया बाबूजी एक तरफ लुढ़क गए।


'बाबूजी!' मेरी चीख निकल गई, 'क्या हुआ बाबूजी को?' निखिल ने बाबूजी की नब्ज देखी फिर - धीरे से बोले, 'अनु, हम बाबूजी को रोक नहीं सके,

वह चले गए।' यह कहकर निखिल रोने लगे थे।


'नहीं, बाबूजी ऐसे कैसे जा सकते हैं.. पहले भी वे मुझे अचानकर छोड़कर चले गए थे और फिर अचानक..' मैं बाबूजी से लिपटकर रोने लगी थी।


मैं रोती जा रही थी। मुझे लगा जैसे बाबूजी के चित्र में से उनका हाथ बाहर निकलकर आया और जैसे उंगली के पोर पर मेरे आंसू की बूंद उठाकर बाबूजी बोल उठे, 'मेरे लिए ये आंसू नहीं मोती हैं, इन्हें व्यर्थ मत बहाया कर।' मैंने देखा बाबूजी का निष्प्राण शरीर वैसा ही पड़ा था और चित्र भी वैसा ही रखा था।


मैं चाह रही थी कि बाबूजी को झकझोर दूं। शायद बाबूजी एक क्षण के लिए जी उठें और उसी क्षण मैं बाबूजी का भरपूर स्नेह पा लूं। लेकिन चाहने से क्या होता है। कभी-कभी सच विषाक्त होता है और सच

यह था कि अपने ज़िद्दी बाबूजी को मैं रोक नहीं सकी थी। मन भीतर ही भीतर चीख रहा था, बाबूजी को पुकार रहा था, 'बाबूजी प्लीज़ उठिए न। देखिए मेरे आंसू बहते जा रहे हैं, उन्हें अपनी उंगली के पोर पर - रोक लीजिए। प्लीज! बाबूजी उठिए न..'


SARAL VICHAR

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