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मां का निर्णय | Silence aur Old Age Home ki Kahani

मां का निर्णय | Silence aur Old Age Home ki Kahani - www.saralvichar.in

सुलभा को लगा जैसे उनके कानों में पिघलता हुआ सीसा उड़ेल दिया हो। कितने उत्साह से आज वो गांव की जमीन की आमदनी घर लाई थीं और यही बात बताने के लिए शिखर के कमरे में जा रही थीं, तभी उन्होंने सुना शिखर की पत्नी कह रही थी, 'मैं न कहती थी, जब तक तुम्हारी मां इस घर में रहेंगी, तब तक इस घर में कोई नया मेहमान नहीं आएगा। देखो वो पन्द्रह दिनों के लिए बाहर गईं और यह शुभ सूचना आई। सुनो, अब मैं कोई नया कलह नहीं चाहती। उनसे कह दो वो यहां से चली जाएं।'


'पर वो जाएंगी कहां? जब तक दीक्षा का विवाह नहीं हुआ था, तब तक मां उसी के साथ रहती थीं, पर उसकी शादी के बाद तो वो हमारी ही जिम्मेदारी हैं और मैं किसी के क़दमों को शुभ-अशुभ नहीं मानता। पता नहीं किसने तुम्हारे दिमाग़ में यह बातें भर दी हैं।'


'मैं वो सब नहीं जानती, पर मुझे ऐसा महसूस होता है। तुम्हारी मम्मी के क़दम मेरी जिंदगी के लिए शुभ नहीं हैं और तुम खुद भी तो एक डॉक्टर हो। इस बात को अच्छे से जानते हो कि गर्भावस्था में किसी भी प्रकार का तनाव नुक़सानदायक हो सकता है। यह आने वाले बच्चे के लिए हानिकारक हो सकता है।'


इससे अधिक सुलभा सुन न पाई। जिस सूचना का इंतजार उसे पिछले नौ सालों से था, वह मिली भी तो इस रूप में। पति की मृत्यु के समय शिखर एमबीबीएस की अंतिम साल की परीक्षा दे रहा था। चूंकि पति सरकारी महकमे में अच्छे पद पर थे, तो मृत्यु के बाद भी सुलभा को किसी तरह की आर्थिक परेशानी नहीं आई और उसने शिखर को मास्टर्स की डिग्री भी दिलवा दी। बेटी दीक्षा को भी एमबीए करवा दिया। सरकारी नौकरी के कारण पति को अपनी पुश्तैनी जमीन भाइयों को देख-रेख के लिए देकर उत्तर प्रदेश के दूर गांव से मध्यप्रदेश के ग्वालियर में आना पड़ा। खेती से आई आमदनी और अच्छे वेतन की बदौलत ग्वालियर के अच्छे इलाके में ही अपना घर भी बनवा लिया था तथा दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया। सुलभा स्वयं भी एमए तक शिक्षित थीं, अतः शिक्षा का महत्व अच्छी तरह समझती थीं।


बेटे की सागर के सरकारी अस्पताल में नौकरी लगने के बाद जब विवाह की बारी आई, तो सुलभा ने नीलिमा के रूप में एक सुशिक्षित कन्या का चयन किया, जो स्वयं एक कॉलेज में प्राध्यापक थी। जब तक दीक्षा का विवाह नहीं हुआ था, तब तक दोनों मां-बेटी ग्वालियर में ही रहती थीं, लेकिन अब पिछले सात सालों से वह शिखर के साथ सागर में ही रहती थी। यूं तो पीढ़ियों के टकराव अक्सर हो जाया करते थे और उसके व नीलिमा के बीच कुछ खट-पट भी होती रहती थी, किन्तु नीलिमा के दिल में यह बात है वह सोच भी नहीं सकती थी। शिखर सदा की तरह तटस्थ ही बना रहता था।


सुलभा अपने कमरे में वापस आ गईं। इतनी बड़ी खुशखबरी सुनकर भी वह प्रतिक्रिया विहीन थीं। उनके दिमाग में कई तरह के सवाल उठ रहे थे। दिल कह रहा था, 'बहू के साथ रह कर उसे सही ढंग से निर्देशित करें।' जबकि दिमाग कह रहा था 'बेटे-बहू अब बच्चे नहीं हैं, शिक्षित हैं अपना ध्यान रखने के लिए परिपक्व हैं। उन्हें किसी तरह की स्पूनफीडिंग की जरूरत नहीं है।'


स्पून फीडिंग की जरूरत तो उस समय भी नहीं थी, जब शिखर पीएमटी की परीक्षा देने जा रहा था। तब वह स्वयं आया व पैर छू कर बोला, 'मम्मी दही-शक्कर खिला दो, आपके हाथ से दही- शक्कर खाकर जाता हूं, तो पेपर अच्छा जाता है।' न जाने किस बात पर बात चल रही थी, तब पति ने कहा था यदि जिंदगी में ऐसा अवसर आया जब मुझे तुम्हारे बिना रहना पड़े, तो मैं बच्चों के पास नहीं रहूंगा। मैं उनके अस्तित्व व उनकी विचारधारा में बाधक नहीं बनूंगा। आजकल कई ओल्डएज होम्स खुल गए हैं, मैं वहीं पर रहूंगा।


शिखर हमेशा की तरह चुपचाप ही था अपनी तरफ़ से उसने कोई बात नहीं की। यह भी नहीं पूछा कि चाचा-ताऊ से क्या बात हुई। जमीन की आय का कितना पैसा उन्होंने दिया। गांव के मकान की छत डलवानी थी वो डलवाई या नहीं। उसे वैसे इन सब चीजों की जरूरत थी भी नहीं। दोनों पति-पत्नी मिलकर दो-ढाई लाख रुपए महीने जो कमा लेते थे।


फिर सोचने लगीं क्यों न बेटी-दामाद के साथ रहा जाए। पर वो तो स्वयं अपने सास-ससुर के साथ रहती है। दामाद अवश्य सुशील व समझदार है, किन्तु दीक्षा की सास के साथ रहना कठिन होगा। एक-दो दिन के लिए जाओ, तब भी सुना देती हैं। फिर लंबे समय रहने से तो कड़वाहट बढ़ेगी और इसका असर बेटी के वैवाहिक जीवन पर भी पड़ सकता है।


आने वाले दो हफ्ते कर्फ्यू जैसे तनाव वाली शांति से गुजरे। न ही नीलिमा ने, न ही शिखर ने, आने वाले बच्चे के बारे में सुलभा को बताया। सुलभा ने भी औपचारिक बातों के अलावा कोई बात नहीं की। आज डाइनिंग टेबल पर डिनर के लिए तीनों बैठे थे। एक अजीब-सी ख़ामोशी थी। सुलभा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, 'शिखर मैं कल जा रही हूं।'


'कहां मम्मी?' शिखर ने पूछा।


'हरिद्वार' सुलभा ने बताया।


'किसके साथ और क्यों?' शिखर ने फिर पूछा। 'अकेले ही जा रही हूं। वहां के एक ओल्डएज होम में रहूंगी। ग्वालियर वाला घर, तुम्हारे पापा की पेंशन, एफडी वगैरह सभी उस होम के नाम कर दी है। वहां पर अपनी उम्र के लोगों के बीच समय भी अच्छे से कट जाएगा। सागर से हरिद्वार तक ले जाने का इंतजाम उन्होंने कर दिया है।'


'पर मां, गांव में अपने घर भी तो जाकर रह सकती हो।' शिखर ने औपचारिक प्रतिरोध किया।


'नहीं, वहां भी तुम्हारे चाचा-ताऊ के बच्चे बड़े हो गए हैं वहां पर अस्पताल, डॉक्टर भी नहीं हैं, तो देखभाल में परेशानी तो होगी ही। गांव की जमीन से होने वाली आय, आधी तुम्हारी व आधी दीक्षा की होगी। और हां बच्चा होने के बाद उसकी एक फोटो भिजवा देना। शायद मेरा आना संभव न हो। तुम्हारे पिताजी कहा करते थे, बच्चों की विचारधारा एवं अस्तित्व में माता-पिता को बाधक नहीं बनना चाहिए। मेरा वृद्धाश्रम जाना शायद उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगा।'


नीलिमा कुछ न बोली और शिखर ने कहा, 'जब आपने फ़ैसला लिया है, तो अच्छी तरह सोचकर ही लिया होगा।'


उस रात सुलभा को तनावरहित गहरी नींद आई।


-रिमझिम हरीश जायसवाल

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