नितिन के फोन पर वकील साहब का फोन आया। "नितिन जी, एक बुरी खबर है।" नितिन चिंतित होकर बोला, "अब बुरी खबर कहाँ से आ गई? आप तो कह रहे थे एक-दो सुनवाई में हम केस जीत जाएंगे?"
वकील साहब बोले, "मुझे खबर मिली है, आज आपका छोटा भाई अरुण आपके दुश्मनों की तरफ से आपके खिलाफ गवाही देने वाला है।"
भाई का नाम सुनते ही नितिन के दिल में एक गुब्बार सा उठा। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। वकील साहब ने पूछा, "आपके भाई के साथ आपका कोई विवाद चल रहा है क्या? वह आपके दुश्मनों के साथ कैसे मिल गया?"
नितिन बुझे स्वर में बोला, "विवाद तो कोई खास नहीं चल रहा वकील साहब। मगर चार-पांच साल से भाई से बोलचाल बंद है।"
वकील साहब ने कहा, "अगर विवाद नहीं चल रहा तो उसे फोन करके मना कीजिए। अगर आपके भाई ने आपके खिलाफ गवाही दी तो हमारा केस कमजोर पड़ जाएगा।"
नितिन ने पूछा, "मगर इस केस से भाई का क्या लेना-देना है? उसकी गवाही से केस कैसे कमजोर पड़ जाएगा?"
वकील साहब ने समझाया, "अगर आपका भाई यह गवाही दे दे कि आप लालची और धोखेबाज किस्म के हो, आपने उसके साथ भी संपत्ति बांटने में बेईमानी की है, तब इस केस में हमें अपनी ईमानदारी सिद्ध करने में परेशानी होगी। आप एक बार अपने भाई से बात कीजिए।"
वकील साहब के फोन रखने के बाद नितिन बेचैन हो गया। भाई दुश्मनों के साथ मिल गया है, यह सोचते हुए उसका दिल बैठा जा रहा था।
नितिन की पत्नी राधा रसोई में काम करते हुए सब सुन रही थी। वह नितिन के पास आकर बोली, "क्या कह रहे हैं वकील साहब? देवर जी हमारे खिलाफ गवाही दे रहे हैं?"
नितिन बुझे मन से बोला, "अरुण से मुझे यह उम्मीद नहीं थी, राधा। खुद की भुजा ही शरीर को नुकसान पहुंचाएगी तो हम कैसे जीतेंगे?"
राधा बोली, "बिक गया होगा आपका भाई। दुश्मनों ने जरूर उन्हें लालच दिया होगा। आप अपने भाई को फोन मिलाइए। मैं बात करती हूँ उनसे।"
नितिन ने कांपते हाथों से भाई को फोन मिलाया। मगर अरुण ने फोन नहीं उठाया।
पत्नी बोली, "आप उनके घर जाइए, उनसे बात कीजिए। हमारे आपसी झगड़े में दुश्मनों को फायदा मिल रहा है। अगर भाई से सुलह नहीं करोगे तो हम हार जाएंगे।"
नितिन विचलित मन से कुर्सी पर पसरता हुआ बोला, "अगर उसे मुझसे बात करनी होती तो फोन उठा लेता। अब घर जाने से भी कोई फायदा नहीं है। तुम चिंता मत करो। जो होगा सो देखा जाएगा।"
नितिन की पत्नी बड़बड़ाती हुई वापस रसोई में चली गई। मगर नितिन के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं। वह उस दिन को कोस रहा था जिस दिन उसने समीर के साथ साझेदारी में जमीन खरीदी थी।
समीर और नितिन ने मिलकर दस साल पहले ₹20 लाख में एक जमीन खरीदी थी। अब जमीन की कीमत ₹50 लाख से ऊपर थी। पिछले दस सालों में नितिन ने समीर को ₹15 लाख उधार दे दिए थे। तब समीर ने कहा था, "तुम वह पूरी जमीन रखो। मेरे हिस्से के पैसे समझ लो मेरे पास आ चुके हैं। जब तुम जमीन बेचोगे तब मैं बिना कुछ पैसे लिए उन कागजों पर दस्तखत कर दूंगा।"
मगर जब नितिन जमीन बेचने लगा तब समीर ने कहा, "आधी जमीन मेरी है, आधे पैसे दोगे तभी दस्तखत करूँगा।"
नितिन बोला, "लेकिन तुम्हारे हिस्से के मैं तुम्हें ₹15 लाख दे चुका हूँ। जब हमने तुम्हारे हिस्से का हिसाब किया था तब जमीन की कीमत ₹30 लाख थी। इसलिए तुम्हारा अब उस जमीन पर कोई हक नहीं है।"
समीर बोला, "समझौते के कागज दिखाओ।" समझौता मौखिक हुआ था। नितिन के पास इसका कोई प्रमाण नहीं था। इसी बात को लेकर दोनों कोर्ट में पहुँच गए थे।
कोर्ट में समीर नितिन के भाई अरुण के साथ पहुंचा था। आज समीर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी, जिसे देखकर नितिन का कलेजा बैठा जा रहा था। मुकदमा शुरू हुआ तब समीर का वकील बोला, "माई लॉर्ड, मेरे मुवक्किल का साझेदार नितिन निहायत ही घटिया आदमी है। धोखा करना इसकी पुरानी आदत है। जिस शख्स ने अपने सगे भाई को नहीं छोड़ा, वह दूसरों के साथ बेईमानी करने से कैसे बाज आ सकता है?"
इतना सुनते ही नितिन का कलेजा धक-धक करने लगा। वह समझ गया कि उसके भाई को पूरी पट्टी पढ़ाकर लाया गया है। हालांकि उसने अपने छोटे भाई के साथ ऐसा कोई धोखा या बेईमानी नहीं की थी। मगर परिवार में औरतों की लड़ाई के कारण दोनों परिवारों में मतभेद थे। अरुण की पत्नी झगड़ालू किस्म की औरत थी। उसी की वजह से दोनों भाइयों में बोलचाल बंद थी।
समीर का वकील बोला, "जज साहब, मैं प्रतिवादी पक्ष के सगे भाई को बतौर गवाह पेश करना चाहता हूँ। मिस्टर नितिन की फितरत कैसी है, आप उसके भाई के मुख से सुन लीजिए।"
फिर अरुण कटघरे में आकर खड़ा हो गया। नितिन ने एक नजर अपने छोटे भाई पर डाली। दोनों भाइयों की नजरें मिलीं। नितिन की नजरों में लाचारी और बेबसी थी, आँखों में पानी था। नितिन ने जैसे आँखों ही आँखों में भाई से पूछा, "तुझे गोद में लेकर घुमा करता था। तेरा पेट भरने के लिए अपने हिस्से की चीजें भी तुझे खिला दिया करता था। आज तू मेरे प्यार का अच्छा सिला दे रहा है।"
भाई से नजरें मिलते ही अरुण ने अपनी नजरें झुका लीं। जज साहब ने इशारा किया तो अरुण ने भगवत गीता की शपथ लेकर बोलना शुरू किया।
"जज साहब, मैं नितिन कुमार का छोटा भाई हूँ। मेरा बचपन उनकी गोद में बीता है। पिता के गुजरने के बाद उन्होंने मुझे पिता का प्यार भी दिया है। अगर उनके आचरण और फितरत के बारे में बताऊँ, तो सिर्फ इतना ही कहूँगा, वो मेरे लिए भगवान राम हैं। वो कभी झूठ नहीं बोलते। जो इंसान झूठ नहीं बोलता, वो भला किसी के साथ बेईमानी और धोखा कैसे कर सकता है।"
अरुण के इतना कहते ही समीर और उसके वकील का मुँह उतर गया। उधर नितिन की आँखें भर आईं। वह भाई को ऐसे निहार रहा था जैसे बचपन में उस मुस्कुराते देखकर निहारा करता था।
अरुण बोला, "जज साहब, ये समीर और उसका वकील कल मेरे घर आए थे। इन लोगों ने मुझे पैसों का लालच देकर मेरे भाई के विरुद्ध बोलने के लिए तैयार किया था। इन्होंने मुझे क्या-क्या कहा, उसका मैंने वीडियो बना लिया है।"
फिर जेब से उस वीडियो का सबूत अरुण ने जज साहब को सौंप दिया। जज साहब ने वीडियो देखा फिर अपना फैसला नितिन के पक्ष में सुना दिया। और समीर और उसके वकील के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने का आदेश दे दिया।
कोर्ट के बाहर निकलते ही नितिन की नजर भाई को तलाश कर रही थी। मगर अरुण... भाई की नजर बचाकर चुपके से अपने घर चला गया था। नितिन ने अरुण को फोन लगाया तो उसने फोन भी नहीं उठाया। मतलब नाराजगी अब भी कायम थी। भाई अपना फर्ज निभाकर चुपचाप अपने घर चला गया था।
घर पहुँचने पर नितिन की पत्नी ने पूछा, "मुकदमे का क्या हुआ?" नितिन बोला, "भाई साथ था इसलिए हम जीत गए।"
फिर उसने पत्नी को कोर्ट में जो हुआ, वह सब बताया। सुनकर पत्नी की आँखें भी नम हो गईं। उसके बाद नितिन अपने पूरे परिवार को लेकर अरुण के घर गया। पुराने गिले-शिकवे दूर किए और दोनों भाई गले मिल गए। दोनों परिवार फिर से एक हो गए।
कहानी का नैतिक: भाइयों के बीच आपस में कितने भी मतभेद हों, नाराजगी हो, मगर जब भाई संकट में हो तो उसकी ढाल बन जाओ। एक और एक मिलकर 11 बन जाओ और दुश्मन के 12 बजा दो, यही एक भाई का कर्तव्य है।
-डी आर सैनी
SARAL VICHAR
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