हरिकिशन, जिनकी उम्र 55 वर्ष थी, एक बार फिर अपनी नौकरी गंवा चुके थे। इस बार तो ऑफिस से निकालते वक्त मैनेजर ने उन्हें सभी के सामने अपमानित भी किया। पिछले एक साल में यह चौथी बार था जब उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा था, और यह सिलसिला उनके लिए बेहद मुश्किल होता जा रहा था।
रात के साढ़े नौ बज चुके थे। वह शहर की भीड़-भाड़ से दूर, एक पुराने मंदिर के पास वाली बेंच पर बैठे थे। उन्हें घर लौटने का बिल्कुल मन नहीं था। अपनी इस दुर्दशा में, वह अपने पुराने दोस्तों और जानकारों को फोन कर-करके मदद मांग रहे थे, बस एक ही गुहार थी, "भाई, कहीं काम हो तो बता देना, बहुत ज़रूरत है नौकरी की।"
हरिकिशन कोई कामचोर व्यक्ति नहीं थे, लेकिन कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल ने उनकी मेहनत को पीछे छोड़ दिया था। उन्होंने कंप्यूटर सीख तो लिया था, पर नई पीढ़ी के लड़कों जैसी महारत उन्हें नहीं थी। कई बार वह गलती से फाइलें डिलीट कर देते या ईमेल गलत व्यक्ति को भेज देते। इन्हीं छोटी-छोटी गलतियों पर बॉस नाराज होते और उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता।
जब वह घर लौटे और अंदर कदम रखा, तो उनकी पत्नी सरोज चिल्लाईं, "कहाँ थे अब तक? किस औरत के साथ घूम रहे थे? तुमको शर्म भी नहीं आती क्या? घर में जवान बेटा और बेटी बैठे हैं, और तुम आवारागर्दी कर रहे हो! उनकी शादी की उम्र निकलती जा रही है, कब होश आएगा तुम्हें? अगर जिम्मेदारी नहीं निभानी थी, तो पैदा ही क्यों किया था?" हरिकिशन ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपनी पत्नी की रोज-रोज की किचकिच का जवाब देना छोड़ चुके थे।
वह बाहर लगे नल से हाथ-मुँह धो रहे थे, तभी बेटी नीतू दौड़ती हुई आई। "पापा, आप मेरे लिए मोबाइल लाए क्या?" हरिकिशन ने उसे कोई जवाब नहीं दिया। नीतू फिर बोली, "पापा, आप जवाब क्यों नहीं देते? सुबह तो आपने पक्का वादा किया था कि रात को लौटते समय मेरे लिए मोबाइल लेकर आएंगे।" हरिकिशन चुप ही रहे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें, क्योंकि बेटी के लिए मोबाइल के एडवांस की मांग करने पर ही तो बॉस ने उन्हें नौकरी से निकाला था।
नीतू ने फिर कहा, "आपको क्या लगता है पापा, मैं झूठ बोल रही हूँ? देखो, ये मोबाइल सच में खराब हो गया है, ऑन करते ही हैंग हो जाता है।" हरिकिशन चुप थे। वह अपनी नौकरी जाने की बात किसी को नहीं बताना चाहते थे, क्योंकि वह जानते थे कि अगर यह बताया तो घरवाले उन्हें ही दोष देंगे। बेटा कहेगा – आप काम ठीक से नहीं करते। पत्नी कहेगी – हर महीने नौकरी क्यों छूट जाती है? बेटी कहेगी – वादे करके तोड़ देते हो।
हाथ-मुँह धोने के बाद वह सीधा अपने कमरे में गए। बेड पर उनकी पत्नी सरोज मोबाइल चला रही थी। उनकी नजर मोबाइल स्क्रीन पर थी, लेकिन कान पूरे घर की बातों पर लगे थे। जैसे ही हरिकिशन ने कमरे में कदम रखा, सरोज फिर से चिल्लाईं, "जवाब क्यों नहीं देते? बहरे हो गए हो क्या? नीतू को मोबाइल क्यों नहीं लाकर दिया?" हरिकिशन धीरे से बोले, "पैसे हाथ में नहीं आए। जब मिलेंगे तो ला दूंगा।"
सरोज बोलीं, "अगर पैसे नहीं थे तो उधार ले लेते! तुम जानते हो न कि वो कोचिंग कर रही है। बिना मोबाइल के कैसे पढ़ेगी?" हरिकिशन के पास बहुत कुछ कहने को था, लेकिन अब उन्होंने चुप रहना सीख लिया था। वह रसोई में चले गए। उन्होंने खुद ही थाली निकाली और खाना खाने बैठ गए। अर्जुन, उनका बेटा, 26 साल का हो गया था, और नीतू 22 साल की थी। दोनों पढ़ाई से ज्यादा सोशल मीडिया में व्यस्त रहते थे, इसलिए प्रतियोगिता की तैयारी कभी पूरी हो ही नहीं पाई।
अभी हरिकिशन खाना खत्म भी नहीं कर पाए थे कि अर्जुन बाहर से आता दिखा। वह गुनगुनाता हुआ घर में घुसा, लेकिन जैसे ही बाप को रसोई में देखा, सीधा अपने कमरे में चला गया। हरिकिशन ने देखा कि उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। शायद दोस्तों के साथ पीकर आया था। पहले जब वह पीकर आता था, तो हरिकिशन उसे डांटते थे। एक दिन बेटे ने उनका हाथ पकड़ लिया था। गुस्से में आँखें दिखाकर कहा था – "अब बहुत हो गया, चुप रहिए!" उस दिन के बाद हरिकिशन ने बेटे से कुछ भी कहना छोड़ दिया था।
वह खाना खाकर चुपचाप कमरे में लौट आए। पत्नी की बड़बड़ाहट फिर शुरू हो गई थी, लेकिन हरिकिशन कुछ नहीं बोले और चुपचाप सो गए। सुबह वह जल्दी उठ गए और काम की तलाश में निकल पड़े। वह जानते थे कि बिना नौकरी के घर नहीं चल सकता। बच्चों की पढ़ाई, शादी सब अधूरी रह जाएगी।
वह सुबह से शाम तक दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे। कहीं भी काम नहीं मिला। भूखे पेट उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। शरीर में कमजोरी और सुन्नपन महसूस हो रहा था। वह सोचते-सोचते चल रहे थे कि कब फुटपाथ से सड़क पर आ गए, उन्हें खुद भी नहीं पता चला। एक तेज ट्रॉला आया और उन्हें कुचलता हुआ निकल गया। हरिकिशन को तड़पने का मौका भी नहीं मिला। सड़क पर ही उनकी मौत हो गई।
अर्जुन, नीतू और सरोज ने रो-रोकर उनका अंतिम संस्कार किया। हरिकिशन के जाने के बाद सब कुछ बदल गया था। जिनसे उधार लिया गया था, वे हर दिन घर आने लगे। रिश्तेदारों ने फोन उठाना बंद कर दिया था। वाई-फाई का कनेक्शन कट गया था। अब घर में इंटरनेट भी नहीं चल रहा था। अब न अर्जुन खाने में कमी निकालता था, न नीतू कोई फरमाइश करती थी। जो भी खाना मिलता, खा लेते और पानी पी लेते।
अर्जुन अब कपड़े की दुकान में 8000 रुपये महीने की नौकरी करने लगा था। नीतू एक छोटे प्राइवेट स्कूल में 5000 रुपये में पढ़ाने लगी थी। सरोज के लिए सब कुछ बदल गया था। माथे का सिंदूर मिटते ही उसका सजने-संवरने का हक भी छिन गया था। अब वह घंटों शीशे के सामने खड़ी नहीं रहती थी। जिस आवाज पर वह रोज झल्लाती थी, अब वही आवाज सुनने के लिए तरस गई थी।
जब पति जिंदा था, तब वह निश्चिंत होकर सो जाती थी। अब एक छोटी सी आवाज भी उसे डरा देती थी। रात भर नींद के लिए तरसती थी। हरिकिशन के जाने के बाद पूरे परिवार को समझ में आ गया था— वह सिर्फ आदमी नहीं था, वह घर की नींव था। वह रोटी था, कपड़ा था, मकान था। वह सुरक्षा था, वह नींद थी, वह चैन था। वह बाजार था, वह सपनों का आधार था।
लेकिन अफसोस, उसकी कदर जीते जी किसी ने नहीं की।
-डी आर सैनी
SARAL VICHAR
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Harikishan story, family support, job loss, financial struggle, parent sacrifice, परिवार की जिम्मेदारी, elder respect, जीवन शिक्षा, home foundation, child upbringing, career challenges, social awareness
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