जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो वह अपनी मुट्ठी बंद रखता है। कहा जाता है कि वह अपना भाग्य मुट्ठी में लेकर आता है। कितनी भी कोशिश करो, वह बच्चा अपनी मुट्ठी नहीं खोलता।
पर यह भाग्य तब ही खुलता है जब वह मेहनत (पुरुषार्थ) करता है।
हर इंसान अकेला इस दुनिया में आता है, अपने भाग्य को आज़माने। उसे परिवार मिलता है, संपत्ति मिलती है। वह बड़ा होकर ज़मीन-जायदाद खरीदता है, घर बनाता है, लोगों को काम पर रखता है, किसी की मदद करता है और कभी-कभी दूसरों के सामने हाथ भी जोड़ता है।
लेकिन जब वह इस दुनिया से जाता है, तो उसके हाथ खुले होते हैं। वह सब कुछ यहीं छोड़कर खाली हाथ चला जाता है। यही जीवन की अजीब सच्चाई है — जो भाग्य वह लेकर आया था, उसे मेहनत से जिया, पर अंत में सब यहीं रह गया। यही परिवर्तन संसार का नियम है।
जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, बहुत कुछ बदलता है — शरीर बदलता है, सोच बदलती है, इच्छाएं और ज़रूरतें बदलती हैं, सपने और योजनाएं बदलती हैं।
जो लोग इन बदलते हालात को समझ जाते हैं और खुद को समय के साथ ढाल लेते हैं, वे ही सच्चे मायनों में समझदार और भाग्यशाली होते हैं।
हमारे ऋषियों ने गहराई से सोचकर जीवन के चार हिस्से (आश्रम) बनाए-
ब्रह्मचर्य (सीखने का समय),
गृहस्थ (परिवार और जिम्मेदारी का समय),
वानप्रस्थ (ध्यान और सेवा का समय),
और संन्यास (त्याग और ईश्वर की भक्ति का समय)।
इन चारों चरणों को उन्होंने जीवन को सफल और सार्थक बनाने का रास्ता बताया।
जो लोग इन बदलावों के साथ मेहनत करते हैं, अपने काम से संतुष्ट रहते हैं, दिल और मन से अच्छे काम करते हैं, अपने भावनाओं में पवित्रता रखते हैं और गुरु व भगवान पर विश्वास रखते हैं — उनका जीवन आख़िर तक खुशहाल और संतोष से भरा रहता है।
इसलिए जवानी का समय भी जल्दी बीत जाता है, पर जो भगवान और गुरु से जुड़े रहते हैं, उनका जीवन अच्छा और सफल होता है।
जो लोग भगवान और गुरु के नियमों को नहीं मानते, उन्हें जीवन में तरह-तरह की मुश्किलें आती हैं।
फिर भी यह सच्चाई है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इंसान की सोच और मन की स्थिति बदलती है।
अगर कोई अपनी उम्र और जीवन के ढंग में संतुलन बना ले, तो वह न सिर्फ स्वस्थ रह सकता है, बल्कि एक खुश, शांत और आगे बढ़
ने वाला जीवन भी जी सकता है।
– श्री सुधांशु जी महाराज
-सरल विचार
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