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पाप के बाप का नाम क्या है | The Real Father of Sin

पाप के बाप की खोज | PAAP KE BAAP KI KHOJ | Searching For The Father Of Sin In Hindi By Saral Vichar

एक बार एक पंडितजी काशी में विद्या अध्ययन करने गये। बारह वर्ष तक पढ़ाई की। सब कुछ पढ़ लिया — वेद, शास्त्र, पुराण, श्रुतियाँ, ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद आदि पढ़कर वापस घर आये तो पिताजी से कहा - “मैं सब कुछ पढ़कर आया हूँ, मुझे सब कुछ याद है, आप कुछ भी प्रश्न पूछिए, मैं उत्तर दूँगा।”

पिताजी बोले - “बेटा, जब सब तुझे याद है तो मेरे एक छोटे से प्रश्न का उत्तर दे दे।”

बेटे ने कहा - “पूछिए पिताजी।”

पिताजी ने पूछा - “सिर्फ इतना बता कि ‘पाप के बाप’ का क्या नाम है?”

पंडितजी ने सोचा - ‘पाप का बाप’? यह तो मैंने कहीं पढ़ा ही नहीं! जो किताबें पढ़ीं थीं, उनमें देखने लगा। रातभर किताबें पलटता रहा मगर ‘पाप का बाप’ नहीं मिला। पिताजी बोले - “तो फिर खाक पढ़ाई की! अभी तक तुझे पाप के बाप का भी पता नहीं।”

बेटे ने कहा - “आख़िर आपका बेटा हूँ, अब तो पाप के बाप को ढूँढकर ही लाऊँगा, चाहे बारह वर्ष और क्यों न बीत जाएँ।” पंडितजी पुनः काशी के लिए रवाना हुए। उस ज़माने में साधन तो थे नहीं, पैदल चलना पड़ता था। काफी दूर तक चले। फिर पंडितजी को प्यास लगी तो एक घर दिखाई दिया।

पंडितजी घर में गये, वहाँ जाकर बोले - “मुझे बड़ी जोर की प्यास लगी है, अगर कोई है अंदर तो मुझे पानी पिलाए।”

एक स्त्री आई और उसने पंडितजी को पानी पिलाया। पंडितजी ने पानी पिया। पानी पीने के बाद पंडितजी ने पूछा — “यह घर किसका है?” उस स्त्री ने कहा - “पंडितजी, यह तो आपको पानी पीने से पहले पूछना चाहिए था कि यह घर किसका है! आपने पानी तो पी लिया और अब पूछ रहे हैं कि यह घर किसका है? तो सुन लीजिए पंडितजी - यह घर एक वेश्या (गणिका) का है।”

पंडितजी सुनते ही एकदम कान पकड़ लिए - “शांतं पापम्! शांतं पापम्! मेरे द्वारा पाप हो गया। मैंने एक वेश्या के घर का पानी पी लिया। अरे! पाप का बाप तो मिला नहीं, पाप और हो गया।”

लेकिन उस वेश्या ने कहा - “पंडितजी, आप आगे कहाँ जा रहे हैं?” पंडितजी ने सारी बात बताई और कहा - “पाप के बाप को ढूँढने वापस काशी जा रहा हूँ।”

उस वेश्या ने सोचा - “बारह वर्ष काशी में पढ़कर आये हैं, फिर भी पाप के बाप का पता नहीं चला! यह फिर जा रहे हैं। अरे! वहाँ मिले न मिले, जब मेरे पास आये हैं तो मैं ही बता देती हूँ कि पाप का बाप कौन है।” लेकिन उसने सीधे-सीधे नहीं बताया, युक्ति से बताया।

वेश्या ने कहा - “पंडितजी! आप जाइए, लेकिन आप बहुत थके हुए लगते हैं। शायद काफी दूर से आ रहे हैं, और आपको भोजन भी करना है। आप थोड़ी देर आराम कर लीजिए, तब तक मैं आपके लिए भोजन बना देती हूँ। भोजन करके पधारिए।”

पंडितजी बोले - “तेरे घर का और मैं भोजन करूँ? कदापि नहीं! पानी पी लिया, उसका भी प्रायश्चित कर रहा हूँ।”

वेश्या ने कहा - “तो सीधा (सामग्री) ले लीजिए - आटा, दाल, घी, शक्कर - मैं दे देती हूँ, आप स्वयं बना लीजिए।”

पंडितजी बोले - “तेरे घर का सीधा भी नहीं लूँगा! तू वेश्या और मैं पंडित!”

तब वेश्या ने कहा - “पंडितजी! सीधा सामान ले लोगे तो मैं आपको पाँच सोने की मोहरें दूँगी।”

पंडितजी ने सोचा -‘वो पाप का बाप तो पता नहीं कहाँ मिलेगा, यह मोहरें हाथ से निकल जाएँगी।’

पंडितजी को इतनी देर सीधा लेने में तकलीफ़ हो रही थी, लेकिन पाँच सोने की मोहरें सुनते ही तकलीफ़ गायब! बोले — “ठीक है! तेरा इतना आग्रह है तो ले लेता हूँ।” वेश्या ने आटा, दाल, घी, शक्कर सब निकालकर दे दिया। पंडितजी भोजन बनाने लगे।

तब वेश्या आई और बोली - “पंडितजी! आपने मेरे घर का पानी पिया है, सीधा लिया है, तो अब मैं आपके लिए भोजन बना दूँ तो कैसा रहेगा?”

पंडितजी बोले - “ज्यादा मत बोल! तेरे घर का सीधा ले लिया, यही बहुत है। तेरे हाथ का बना भोजन मैं क्या करूँगा?”

वेश्या बोली - “चिंता मत करो पंडितजी! मैं आपको पाँच सोने की मोहरें और दूँगी।”

पंडितजी ने सोचा - “कुल दस हो जाएँगी!” बोले - “तो ठीक है, स्नान करके बनाएगी तो चलेगा।”

वेश्या ने स्नान करके पंडितजी के लिए भोजन बनाया। पंडितजी बोले - “बस, अब चली जा! मैं स्वयं भोजन कर लूँगा।”

वेश्या ने कहा - “पंडितजी! आपके लिए बनाया है तो सिर्फ पाँच ग्रास मेरे हाथ से ले लीजिए।”

पंडितजी बोले -“इतनी छूट दे दी, अब हाथ पकड़ रही है?” वेश्या बोली - “महाराज! पाँच ग्रास ले लोगे तो मैं आपको पाँच सोने की मोहरें और दूँगी।”

पंडितजी ने सोचा - “कुल पंद्रह मोहरें!” बोले - “ठीक है, पाँच ग्रास तेरे हाथ से ले सकता हूँ, पाँच से ज़्यादा नहीं।”

वेश्या बोली - “ठीक है महाराज! पाँच बस।”

वेश्या ने थाली परोसी, पंडितजी सामने, वेश्या बीच में थाली। वेश्या ने पहला ग्रास लिया, हाथ से पंडितजी के मुँह की ओर बढ़ाया। पंडितजी ने मुँह खोला। जैसे ही मुँह खोला - वेश्या ने जोर से गाल पर थप्पड़ मारा!

पंडितजी आग-बबूला “तेरी इतनी हिम्मत! तू वेश्या होकर पंडित को थप्पड़ मारती है?”

वेश्या बोली - “पंडितजी! अपराध मैंने नहीं, आपने किया है!”

पंडितजी बोले - “मैंने क्या अपराध किया?”

वेश्या बोली - “आप मेरे घर का पानी पीते हैं?” - “नहीं।”
“मेरे घर का सीधा सामान लेते हैं?” - “नहीं।”
“मेरे हाथ का भोजन खाते हैं?” - “नहीं।”
“फिर खाने के लिए क्यों तैयार हुए?”   पंडितजी बोले - “तेरे आग्रह से, प्रेम से!”

वेश्या बोली - “प्रेम से नहीं पंडितजी - लोभ से! आपको पंद्रह सोने की मोहरें दिख रहीं थीं न? लोभ के कारण आप यह सब कर रहे थे! तो अब अपनी डायरी में लिख लो - ‘पाप के बाप का नाम लोभ है!’

पंडितजी की आँखें खुल गईं। पंडितजी वेश्या के चरणों में गिर पड़े - “आप कोई वेश्या नहीं, आप तो मेरी गुरु निकलीं! बारह वर्ष तक मैं जान न सका, आपने एक पल में बता दिया कि पाप का बाप कौन है!”

सरल विचार

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