हमारे पुराने समय के ऋषि-मुनियों और वैदिक ज्ञान में शरीर और गहनों के बीच गहरा संबंध माना गया है। उनके अनुसार स्त्री के शरीर में सन्तान पैदा करने की शक्ति को सही बनाए रखने के लिए ऊर्जा और ठंडक का संतुलन जरूरी होता है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए सोना और चाँदी के आभूषणों का सही जगह पर पहनना बताया गया।
सिर में सोना: सिर में सोना पहनने से शरीर में गर्म ऊर्जा (ऊष्मा) पैदा होती है, जिससे दिमाग सक्रिय और मजबूत बना रहता है।
पैरों में चाँदी: पैरों में चाँदी पहनने से शरीर को ठंडक मिलती है, जिससे गर्मी का संतुलन बना रहता है और शरीर ठंडा-गर्म संतुलन से ठीक चलता है।
इसलिए कहा गया कि सिर को ठंडा और पैर को गर्म रखना चाहिए, यह सेहत के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।
गलत पहनने से क्या होता है?
कहा जाता है कि अगर कोई सिर में चाँदी और पैरों में सोना पहन ले, तो शरीर की ऊर्जा उलट दिशा में बहने लगती है। इससे शरीर में गर्मी और ठंडक का तालमेल बिगड़ जाता है जैसे दो रेलगाड़ियाँ आपस में टकरा जाएँ, वैसे ही शरीर में भी नुकसान होता है।
इसीलिए पुराने ज़माने के विद्वान कहते थे कि सिर में सोना और पैरों में चाँदी ही पहननी चाहिए। जो परिवार सिर्फ सोने के गहने पहनने को शान समझते हैं और चाँदी को तुच्छ मानते हैं, उनके यहाँ की महिलाएँ अक्सर कोई न कोई बीमारी झेलती रहती हैं।
मिश्रित धातु के गहने क्यों नहीं?
गहनों में सोना, चाँदी, ताँबा या जस्ता को मिलाकर या जोड़ लगाकर पहनना भी ठीक नहीं बताया गया। क्योंकि अलग-अलग धातुओं के मिलने से विद्युत ऊर्जा में गड़बड़ी हो जाती है। जैसे समुद्र में जब गर्म और ठंडा पानी टकराते हैं तो तूफान आते हैं, वैसे ही शरीर में भी रोग पैदा होते हैं।
इसीलिए गहने बनाने में अगर जोड़ (टांका) लगाना हो तो वही धातु लगानी चाहिए, जिससे गहना बना हो। तभी वह सुरक्षित माना जाता है।
नाक-कान छिदवाने का विज्ञान
नाक और कान में छेद कर सोने के गहने पहनने का भी वैज्ञानिक कारण बताया गया है।
कान में सोने की बालियाँ पहनने से मासिक धर्म की अनियमितता कम होती है, हिस्टीरिया जैसे मानसिक रोग नहीं होते और आँत से जुड़ी बीमारियाँ (हर्निया) भी नहीं होतीं।
नाक में नथ पहनने से सर्दी-जुकाम, नाक के रोग कम होते हैं।
पैरों की उँगलियों में चाँदी की बिछिया पहनने से प्रसव पीड़ा कम होती है, साइटिका से राहत मिलती है और दिमाग मजबूत रहता है।
पायल पहनने से कमर, घुटनों और एड़ियों के दर्द में आराम मिलता है और हिस्टीरिया या श्वास रोग दूर रहते हैं।
बिंदिया और तिलक का असर
मस्तक पर बिंदिया या तिलक लगाने से मस्तिष्क की ऊर्जा केन्द्रित रहती है और मन शांत रहता है। पुराने समय की बिंदिया पारे के लाल ऑक्साइड से बनती थी, जो लाभदायक थी। पर आजकल बाजार की केमिकल वाली बिंदियाँ उल्टा नुकसान कर सकती हैं।
रत्न और ग्रहों का असर
पुराने ग्रंथों के अनुसार सोने के गहने पवित्रता, सौभाग्य और मन की शांति देते हैं। रत्नों से ग्रहों के दोष कम होते हैं। जैसे हीरा शुक्र ग्रह से जुड़ा है। इसलिए कहा गया कि जिन स्त्रियों को पुत्र चाहिए, उन्हें हीरा नहीं पहनना चाहिए, क्योंकि हीरा शुक्र की शक्ति बढ़ाता है और बृहस्पति (पुत्र का कारक ग्रह) को कमजोर कर सकता है। हालाँकि, यह ज्योतिषीय मान्यता है, इसका सीधा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
सच्चाई क्या है?
इन सब बातों में कुछ बातें आयुर्वेदिक और प्राचीन विद्युत संतुलन के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जिनका तात्पर्य यह था कि शरीर की ऊर्जा सही दिशा में बहती रहे। आधुनिक विज्ञान ने अभी तक इसे पूरी तरह नहीं माना है, लेकिन बहुत सी बातें जैसे नाक-कान छेदना, पायल पहनना, बिंदिया लगाना, इनका सीधा संबंध एक्युप्रेशर और नसों के दबाव से भी जुड़ा है। इसलिए इन परंपराओं को आज भी बहुत लोग मानते हैं।
संक्षेप में:
पुराने समय में गहनों का मकसद सिर्फ शोभा नहीं था, बल्कि शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखना भी था। सही ढंग से पहने गये गहने शरीर को ऊर्जा, शक्ति और संतुलन देते हैं, यही इस परंपरा का असली रहस्य है।
SARAL VICHAR
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