हम इंसानों की एक आदत होती है,
हमेशा स्वयं को दुखी और दूसरों को हमसे खुशकिस्मत समझते हैं।
जबकि सच तो यह है कि भगवान ने सभी को अपने-अपने हिस्से की ख़ुशी और ग़म दोनों दिए हैं।
एक बार एक दुखी भक्त ईश्वर से शिकायत करने लगा-
“प्रभु! आप मेरा ख्याल नहीं रखते। मैं आपका इतना बड़ा भक्त हूँ, आपकी सेवा करता हूँ, रात-दिन आपका स्मरण करता हूँ, फिर भी मेरी जिंदगी में सबसे ज्यादा दुःख क्यों हैं?
दूसरों को तो आप सुख-सुविधाएं देते हो, लेकिन मेरे हिस्से में केवल दुख ही आए हैं।”
भगवान मुस्कुराए और बोले-
“नहीं बेटा, ऐसा नहीं है। सबके अपने-अपने दुःख और परेशानियां हैं।
हर एक को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है। यह मात्र तुम्हारी गलतफहमी है।”
लेकिन भक्त मानने को तैयार नहीं था।
बार-बार की शिकायत सुनकर भगवान ने उपाय निकाला।
वे बोले,
“देखो, उस बड़े पुराने पेड़ पर सब लोगों ने अपनी-अपनी परेशानियों की पोटलियाँ बाँधकर टांग रखी हैं।
बीमारियाँ, तकलीफें, दरिद्रता, तनाव, चिंता, सब वहीं लटकी हैं।
तुम भी अपनी पोटली वहां टांग दो। लेकिन शर्त यह है कि बदले में तुम्हें कोई और पोटली चुनकर ले जानी होगी।”
भक्त बहुत खुश हुआ और तुरंत अपनी पोटली बांधकर टांग आया।
लेकिन जब उसने दूसरी पोटली उठाने की कोशिश की तो उलझ गया-
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“ये छोटी वाली लूं… मगर इसमें क्या होगा?”
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“अगर इसमें गंभीर बीमारी निकली तो?”
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“अरे, यह तो और भी बड़ी लग रही है!”
इतना कन्फ्यूजन कि कोई भी पोटली उठाने की हिम्मत न हुई।
तभी भगवान प्रकट हुए और बोले-
“क्यों, क्या हुआ? पसंद आई कोई पोटली?”
भक्त हाथ जोड़कर बोला-
“नहीं प्रभु! मैं नादान था जो खुद को सबसे दुखी मान रहा था।
अब समझ गया हूँ कि हर किसी के पास अपने-अपने दुःख हैं।
कम-से-कम मुझे अपनी परेशानियां तो मालूम हैं, पर दूसरों की पोटलियों में क्या है, कौन जानता है?
अब मैं निराश नहीं होऊँगा। अपनी चिंताओं का सामना स्वयं करूंगा।”
हमें केवल ईश्वर पर भरोसा रखकर अपने कर्म करते रहना चाहिए।
सुख-दुःख का चक्र जीवन का हिस्सा है।
ECG मशीन देखी है आपने?
उसमें लाइन ऊपर-नीचे होती है तो जीवन चल रहा है।
लेकिन यदि लाइन सीधी हो जाए तो मतलब इंसान मर चुका है।
इसी तरह दुख और चिंताएँ ही हमारे जीवन की ऊपर-नीचे होती लहरें हैं।
ये हमें याद दिलाती हैं कि... हम जीवित हैं।
सरल विचार
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