ईश्वर को पाने से ज्यादा सरल और कोई बात नहीं है। ईश्वर अत्यधिक सरल है, सरलतम है, ईश्वर को पाने से ज्यादा सरल कोई बात नहीं है।
मछली अगर पूछने लगे कि सागर कहां है? मैं उसे पाना चाहती हूं। तो हम मछली से क्या कहेंगे?
तुम हो और तुम बिना सागर के नहीं हो सकती हो। तुम जहां हो, वहीं सागर है। तुम सागर से निर्मित होती हो। सागर ही तुम हो और सागर में ही विलीन हो जाती हो।
मछली के लिए सागर जितना सरल है, मनुष्य के लिए परमात्मा भी उतना ही सरल है। क्योंकि परमात्मा का क्या अर्थ होता है? परमात्मा का अर्थ होता है, जीवन धारा। परमात्मा का अर्थ होता है, वह जो जीवंत, जो प्राण, जो चेतना, वह जो सबमें व्याप्त है, वही।
तो उसके बिना तो हम एक क्षण नहीं हो सकते। हम परमात्मा में ही जीते हैं, उसी के सागर में लहर की तरह पैदा होते और विलीन हो जाते हैं। तो जिससे हम निर्मित होते हैं, जिसमें हम जीते हैं, जिसमें हम मिटते हैं, उसे पाना कठिन कैसे हो सकता है? उसे खोना कठिन हो सकता है, पाना कठिन नहीं हो सकता है।
मछली सागर को खोना चाहे, तो कठिनाई शुरू होगी। पाने के लिए कौन सी कठिनाई है? पाया ही हुआ है।
ईश्वर को खोना कठिन है, पाना नहीं। इतनी कठिनाई में पड़ गई है सारी मनुष्य-जाति, वह इसलिए कि हम ईश्वर को खोने की कोशिश कर रहे हैं।
यह जो मनुष्य इतना उजड़ा, इतना हीन, चिंतित, दुख भरा दिखाई पड़ता है, यह किसलिए? यह इसलिए कि हम ईश्वर को खोने की कोशिश कर रहे हैं।
हम ईश्वर को पाए ही हुए हैं। उसे हमने एक क्षण को खोया नहीं, हम एक क्षण को उससे अलग नहीं हुए हैं। हम एक क्षण को भी उसके बिना जी नहीं सकते, श्वास नहीं ले सकते।
हम घर को छोड़ कर भाग सकते हैं, पत्नी को छोड़ कर भाग सकते हैं, बच्चों को छोड़ कर भाग सकते हैं, गांव को छोड़ कर भाग सकते हैं, अपने को छोड़ कर कैसे भाग सकते हैं? और कहां भागेंगे? जहां जाएंगे, पाएंगे कि साथ मौजूद हो गए हैं। अपने को छोड़ कर कोई भी नहीं भाग सकता। ईश्वर तो मुझमें ही है।
बीज के लिए सबसे सरल बात क्या है?
बीज के लिए सबसे सरल बात यह है कि वह अंकुर बन जाए। इससे ज्यादा सरल बात और कोई भी नहीं है। बीज के लिए कठिनाई होती होगी, तो यही होती होगी कि अगर वह बीज ही रह जाए और उसमें अंकुर न फूट सकें।
आप कहेंगे, इतना कह लेने से, मान लेने से भी कुछ सरल नहीं हो सकता।
अब तक उसकी कठिनाई को बढ़ाने के लिए बहुत-बहुत प्रकार के रास्ते अपनाए गए हैं कि उसे पाना हो तो किसी संगठन के हिस्से होना चाहिए, किसी संप्रदाय का सदस्य होना चाहिए। किसी भीड़ के साथ खड़े होना चाहिए, तब वह प्रभु को पा सकता है!
भीड़ से प्रभु का क्या संबंध है? प्रभु से संबंध हमेशा व्यक्ति का होता है, अकेली निजता में होता है। अकेलेपन में होता है, एकांत में होता है। वहां तो अकेले आदमी को जाना पड़ता है, अकेले को लेकर। क्राइस्ट को कब मिलता है परमात्मा? अकेले में, एकांत में। मुहम्मद को कब मिलता है? अकेले में, एकांत में। महावीर को कब मिलता है? अकेले में, एकांत में। बुद्ध को कब मिलता है? अकेले में, एकांत में।
आज तक कभी भीड़ ने परमात्मा का साक्षात्कार किया है? आज तक दुनिया की कोई भी भीड़ कभी परमात्मा के सामने उपस्थित हो सकी है?
लेकिन हमें यह सिखाया गया है कि बिना हिंदू हुए कोई धार्मिक नहीं हो सकता। बिना मुसलमान हुए कोई धार्मिक नहीं हो सकता। और मैं आपको कहता हूं, जब तक कोई हिंदू है, जब तक कोई मुसलमान है या कोई और धर्म... तब तक उसके धार्मिक होने की कोई संभावना नहीं है। यही तो वजह है कि धर्मों के नाम पर इतना अधर्म हो सका।
अगर परमात्मा की तरफ सरलता का अनुभव करना है, तो पहली बात यह है, इस बात को समझ लेना ठीक से कि वह अकेले का साक्षात है।
वहां आपका निजी मित्र भी आपके साथ नहीं जा सकता। आपकी पत्नी भी नहीं जा सकती, आपका बेटा भी नहीं जा सकता ।
पाप के लिए भीड़ बड़ी जरूरी है, लेकिन पुण्य के लिए बिलकुल गैर जरूरी है।
अगर आपको प्रेम करना है, तो आप संगठन करते हैं? पहले भीड़ इकट्ठी करते हैं कि हम प्रेम करने जा रहे हैं। आइए, भीड़ इकट्ठी करें, फिर हम प्रेम करें! प्रेम अकेला आदमी करता है।
आपको एक काव्य निर्मित करना है, तो आप भीड़ इकट्ठी करते हैं कि चलो हम कविता करें? काव्य अकेले का अनुभव है। जीवन के जो भी श्रेष्ठ अनुभव हैं, वे अकेले के अनुभव हैं। जीवन के जो भी निकृष्ट अनुभव हैं, वे भीड़ के अनुभव हैं।
क्राउड, भीड़ दुनिया में बड़ी खतरनाक घटना है। लेकिन धर्म भीड़ के साथ जुड़ गया है, इसलिए परमात्मा तक पहुंचना कठिन हो गया है।
हम दरवाजा बंद किए बैठे हैं, तो सूरज बाहर रुका रहता है, प्रतीक्षा करता है, प्रतीक्षा करता है, प्रतीक्षा करता है। हम द्वार खोलते हैं, उसकी किरणें भीतर भर आती हैं, अंधेरा विलीन हो जाता है।
ठीक ऐसे ही हमारे मन के द्वार खुले हों तो परमात्मा हमेशा द्वार पर खड़ा है। द्वार खुले हों तो किरणें भीतर आ जाती हैं जहां रोशनी आ जाती है, अंधेरा मिट जाता है।
-ओशो
प्रस्तुतकर्ता सरल विचार
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