पटपड़गंज सोसाइटी में चार लड़कियों के साथ मेरे रहने का शुरुआती इंतज़ाम हुआ था। पाँचवीं के लिए जगह बन सकती थी, पर कुल मिलाकर जितना मेरा बजट था, उससे कहीं ज़्यादा वहाँ किराया देना पड़ता। पैसों की दिक्कत न होती तो मैं भी उस चार खुले कमरों और तीन बड़ी बालकनियों वाले फ्लैट में, एक व्यवस्थित सोसाइटी में रहना चाहती थी।
मैं पहली बार दिल्ली आई थी और पहली ही बार जब उस सोसाइटी में पहुँची, तो मुझे लगा दिल्ली इतनी ही शानदार है। यह मेरी सहेली की सहेली का रेफरेंस था, इसलिए मुझे एक हफ्ते की मोहलत मिल गई थी, जब तक मैं अपने लिए कोई सेफ मकान न खोज लूं। लेकिन अब मुझे वहाँ रहते हुए महीने से ज़्यादा हो गया था और मेरे पास अपने बजट में मकान लेने के सिवा कोई चारा नहीं था।
सुबह जब शुभांगी और कंचनी अपने महीने का हिसाब बना रही थीं, तो उन्होंने बहुत ब्लंटली कहा,
“तुम अपना फिफ्टीन डेज़ का ही शेयर दो। हम आगे के लिए तुम्हें काउंट नहीं कर रहे हैं। अब तो तुम शिफ्ट ही कर जाओगी न।”
मैं क्या कहती। अभी तक तो मैं सिर्फ मकान ही देख रही थी। मैंने बस इतना कहा,
“मैं चली जाऊंगी दो चार दिन में।”
इस मुर्गी के दड़बे में बस एक ही बात सबसे अच्छी थी कि किराया मेरे बजट में था। मन हुआ प्रॉपर्टी डीलर से कहूं कि कुछ और दिखाए, लेकिन मैंने सिर्फ इतना ही पूछा,
“कब शिफ्ट कर सकती हूं।”
मैं न पटपड़गंज में रहने का रिस्क ले सकती थी, न दफ्तर से रोज रोज जल्दी निकलने का। वे चारों लड़कियां मुझे धकेलने पर आमादा थीं और मेरी बॉस को लगता था कि मैं मकान की आड़ में दफ्तर से गोल मारने के चक्कर में पड़ी रहती हूं। दिल्ली आने के पहले हफ्ते में जो अच्छी फीलिंग आई थी, वह धीरे धीरे न जाने कहाँ गुम हो रही थी।
शिफ्ट करने की बात पर प्रॉपर्टी डीलर का चेहरा बल्ब की तरह चमका और उसने कहा,
“परसों।”
शनिवार पूरा दिन लगाकर मैंने उस डेढ़ कमरे की रगड़ रगड़कर सफाई की। हर कोना इतना चमकता और निखरा हुआ लग रहा था कि वह कमरा मुझे उतना भी बुरा नहीं लगा। यह कमरा मेरा था। यहाँ मैं जैसे चाहूं बैठ सकती थी, पैर पसार सकती थी, जब तक मन हो सो सकती थी, जैसे चाहूं रह सकती थी।
घर से पहली बार निकली थी। अकेली। ऐसे शहर में, जहाँ किसी को नहीं जानती थी। रात में अकेले सोते वक्त थोड़ा डर लगा, लेकिन फिर नींद गहरी हो गई। यह मेरे अपने इकलौते स्वीट होम का पहला दिन था।
सुबह उठते ही पता चला कि मैं पड़ोसियों की हज़ारों निगाहों के बीच फंस गई हूं। इतने पास पास एक दूसरे में झांकते मकान मैंने इससे पहले कभी नहीं देखे थे। जब टूथब्रश और पेस्ट लेकर पीछे की संकरी बालकनी में बने दस इंच के सिंक तक पहुँची, तो देखा कि पड़ोसी की बालकनी इतनी पास है कि मूढ़े पर पैर रखकर उस पार जाया जा सकता है।
बाप रे।
बाथरूम से बाहर निकलना है तो जेनिफर लोपेज़ की तरह नहीं निकल सकते। ठीक से कपड़े पहनकर ही बाहर आना पड़ेगा।
और जो खिड़की कल रात मैंने नहीं खोली थी, उसे खोलते ही सारा रहस्यमय उत्साह भी खत्म हो गया।
यदि मैं उस खिड़की को खोल दूं, तो लगता ही नहीं था कि ये दो अलग अलग घर हैं। इतनी सटी हुई खिड़कियां, जैसे एक ही घर के दो हिस्से हों। कल तक आज़ादी का जोश जो मुझ पर चढ़ा था, आज ठंडा पड़ गया। मेरा मुंह उदास इमोटिकॉन की तरह लटक गया और मन मारकर मैं नाश्ता बनाने में जुट गई।
मुंबई में किसी को किसी से बात करने की फुरसत नहीं होती, ऐसा मैंने सुना था। लेकिन दिल्ली बिल्कुल इसके उलट है। अब तक इस बिल्डिंग के चार अलग अलग लोग मुझसे यह जानने की कोशिश कर चुके थे कि मुझे कोई तकलीफ तो नहीं है। यानी चिंता से ज्यादा पंचायत का जज्बा दिल्ली में कायम है।
एक हफ्ता गुजर जाने के बाद बगल वाली आंटी को मेरे आने जाने का समय पता चल गया था। दूध वाले भैया को मालूम था कि मैं शाम को ही दूध लेने आऊंगी। दो दिन सब्जी लेने न जाऊं, तो बूढ़ी अम्मा टोक देती थीं कि आजकल खाना नहीं बना रही हूं क्या। और तो और मेडिकल स्टोर वाले ने मुझसे कहा, “छुट्टे नहीं हैं, तो कल दे जाना। आप यहीं तीसरी बिल्डिंग में रहने आई हैं ना।”
कई लोगों से मेरी बात होने लगी थी। कुछ लोगों से मन से, तो कुछ लोगों से बेमन से। बस बात नहीं होती थी तो उससे, जो आजकल मेरे साथ ही फुर्ती से सीढ़ियां उतरता था और पता नहीं कहां गुम हो जाता था। न जाने क्यों, अनजानों के बीच उसका चेहरा बड़ा अपना लगता था। जब भी उसे देख लेती, इस शहर की तल्खियों के बीच मुझे राहत मिलती। ऐसा क्यों है, मन से कई बार पूछा, पर जवाब नहीं मिला।
उस रंग उड़ी इमारत में, जहां मैं अब तक बेमन से रह रही थी, पिछले कुछ दिनों से सब कुछ अच्छा लगने लगा था। मेरी टाइमिंग भी अब परफेक्ट हो गई थी। नाश्ता भले ही छोड़ दूं, लेकिन ठीक दस बजे सीढ़ियां उतरना नहीं छोड़ती थी।
कहते हैं प्यार में इंसान बेवकूफ हो जाता है, लेकिन मुझे तो लगा मैं समझदार हो गई हूं। वह चौथी या शायद पांचवीं मंजिल से धड़धड़ाता हुआ उतरता था और मैं उसके परफ्यूम से ही जान जाती थी कि वह नीचे आ रहा है। उसी की मेहरबानी थी कि मैं अब तक दफ्तर देर से नहीं पहुंची थी। उसके लिए मुझे हर हाल में समय पर सीढ़ियों पर होना होता था।
सीढ़ियों से उसकी खुशबू उससे पहले नीचे उतरती थी और मैं हमले के लिए जैसे मुस्तैद रहा जाता है, वैसे तैयार रहती थी। वह मेरी मंजिल तक पहुंचता और मैं तुरंत ताला लगाकर ठीक उसके पीछे धड़धड़ाते हुए उतरने लगती। आखिर उसी को तो देर नहीं हो रही थी। दफ्तर तो मुझे भी जाना था।
एक महीने की मेरी तपस्या का फल यह निकला कि अब वह थोड़ा धीमे उतरने लगा था और उसके कदम तीसरी मंजिल पर ठिठक जाते थे। वह अब गुम नहीं होता था और मैं ठीक उसके पीछे चलते हुए मेट्रो तक पहुंच जाती थी। अब उसे पता चल जाता था कि मैं उसके पीछे हूं।
जाने का यह क्रम हमने, यानी मैंने, बहुत नाप तौल कर तय कर लिया था। मैं लेडीज कोच में सफर करती थी, पर लगभग एक किलोमीटर तक हम साथ चलते थे। कहते कुछ नहीं थे, लेकिन हमें पता होता था कि हम साथ चल रहे हैं।
अब मुझे पूरा यकीन हो चला था कि मैं उसे देखती हूं। वह भी कई बार कनखियों से मुझे देख लेता था। कई बार मन करता कि उससे बात करूं, पर मुझे लगता था कि इससे लड़कियों की इज्जत में कोई इजाफा नहीं होता। मौके की तलाश करना मुझे कभी पसंद नहीं रहा, लेकिन इस बार मैं जाने क्यों मौके का इंतजार कर रही थी।
उसकी निगाहें अब कई बार चलते हुए मुझ पर ठहर जाती थीं। मैं उसे देखते हुए चलती थी, लेकिन जैसे ही उसकी नजरें मुझे तलाशतीं, मैं लापरवाही से इधर उधर देखने लगती। शायद उसे समझ आ जाता होगा कि मैं स्टाइल मार रही हूं। डर भी रहता था कि कहीं किसी दिन ऐसा करते हुए जोर से हंसी न आ जाए।
आज तो बस मेरा दिन बन गया था। मैं दौड़ती हुई मेट्रो प्लेटफॉर्म तक पहुंची, लेकिन लेडीज कोच तक नहीं पहुंच पाई और सामने वाले डिब्बे में ही चढ़ गई। वह पीछे से उसी डिब्बे में चढ़ा। बला की भीड़ में उसने अपनी दोनों बांहें कोने में टिका दीं और मैं उस घेरे में खड़ी रही।
जब स्टेशन पर गेट खुलता, वह अपनी बांहें हौले से हटा लेता, ताकि मुझसे छू न जाए। दरवाजा बंद होते ही मैं फिर उस मजबूत घेरे में आ जाती। धक्का मुक्की उसकी पीठ सहती रही और मैं सुरक्षित खड़ी रही।
राजीव चौक पर जब हम तेज समुद्र की लहर की तरह बाहर फेंके गए, तो मैंने बस इतना कहा, “थैंक्स।” उसने अपने सीने पर हाथ रखा और मुस्कराता हुआ दूसरी तरफ चला गया।
वह एक सुनहरा दिन था। मैं अलसाई सी बिस्तर पर पड़ी थी। रविवार को बिस्तर में अलसाने से अच्छा कुछ नहीं होता। दिल्ली के हिस्से में सुहाने दिन वैसे भी कम ही होते हैं। या तो मौसम तपता है, या फिर बला की ठंड पड़ जाती है।
ऐसे ही एक सुहाने रविवार को, जब सर्दी बस जाने की जिद कर रही थी, दरवाजे पर दस्तक हुई। दो दस्तक तक मैंने ध्यान नहीं दिया। सोचा, बगल वाली आंटी होंगी। लेकिन इस बार थाप कुछ ज्यादा जोर से थी।
मैं कंबल फेंककर भुनभुनाते हुए दरवाजे तक पहुंची, तो देखा हाथ में एक पतीली लिए, शॉल में लिपटा वही हीरो सामने खड़ा था। उसकी आंखें लाल थीं और उसने बुदबुदाते हुए बस इतना कहा,
“कल रात से बुखार है। गैस खत्म हो गई है। दवा लेनी है। चाय उबाल देंगी, प्लीज।”
उसने यह सब इतनी जल्दी कहा कि मैं समझ ही नहीं पाई कि यह मेरी नींद की खुमारी है या सच में वह मेरे सामने खड़ा है।
“आइए,” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला।
“नहीं, मैं यहीं ठीक हूं। आप बस चाय उबाल दीजिए।”
“प्लीज, अंदर आ जाइए। बाहर हवा ठंडी है,” मैंने दरवाजा छोड़ा तो वह बिना नानुकुर अंदर आ गया।
उसने खुद को शॉल में कसकर लपेट लिया था। देखकर लग रहा था कि बुखार तेज है। उसने कहा,
“मैं यहां किसी और को पहचानता भी नहीं। आपका ध्यान आया, तो आपके यहां चला आया।”
मेरा मन हुआ पूछूं कि पहचानते तो मुझे भी नहीं हैं, बस जानते हो। लेकिन मैंने सिर्फ इतना कहा,
“आप ये सब क्यों लाए। ऐसे ही आ जाते, मैं चाय बना देती।”
मैंने बड़ा गिलास भरकर उसे चाय दी। उसने मुस्कराकर कहा,
“आधी आपकी है। मैं आपके हिसाब से लाया था।”
मैं लगभग हंस ही दी। उसने जेब से एक गोली निकाली। वह निगलने ही वाला था कि मैंने पूछ लिया,
“कुछ खाया है?”
उसने सिर्फ सिर हिलाकर मना कर दिया।
“रुको। खाली पेट दवा नहीं खानी चाहिए।”
मैं उठी और उसके लिए ब्रेड स्लाइस सेंक दिए। उसने ब्रेड के टुकड़े बड़े आराम से खाए और चाय पीकर उठ गया।
“अगर कुछ जरूरत हो, तो बता देना। और हां, उस दिन मेट्रो के लिए बहुत धन्यवाद।”
“धन्यवाद की क्या बात है। अब जरूरत नहीं पड़ेगी। दवा ले ली है, बुखार उतर जाएगा। वैसे भी अब हिम्मत नहीं है नीचे आने की। अभी भी बहुत मुश्किल से आया हूं,” वह थके हुए स्वर में बोला।
मैंने अपने पाजामे की जेब से मोबाइल निकाला और अधिकार से कहा,
“नंबर बोलिए।”
यकीन से कह सकती हूं, अगर उसकी तबीयत ठीक होती तो वह मारे खुशी के बालकनी से छलांग लगा देता। लेकिन वह भी कम नहीं था। जाते जाते बोला,
“आप उस दिन बहुत अच्छी लग रही थीं।”
अब मेरा मन किया कि मैं छलांग लगा दूं।
अब हालत यह है कि सुबह जब तक मेरे मोबाइल स्क्रीन पर गुड मॉर्निंग न चमके, मैं उठती नहीं। भट्ठी जैसी तपती किचन में भी फटाफट दो लोगों का नाश्ता बनाती हूं, लंच पैक करती हूं और स्टेशन पर उसे पकड़ा देती हूं।
राजीव चौक तक हम साथ जाते हैं और अब लौटते भी साथ हैं। मैं कनॉट प्लेस में पूरे दिन के लिए अपने दफ्तर में समा जाती हूं और वह ट्रेन बदलकर शाम होने के इंतजार में कुतुब मीनार के आसपास अपने दफ्तर में दिन गुजारता है।
वह नपा तुला बोलता है और मैं नाममात्र को ही चुप रह पाती हूं। उसकी संजीदगी का आलम यह है कि लक्ष्मी नगर के मोड़ पर रुक जाता है, ताकि बिल्डिंग में कोई साथ आता हुआ न देखे।
उसी ने मुझे दिल्ली की बहुत सी जगहें घुमाई हैं। उसका कहना है कि अगर किसी शहर के रास्ते जाने पहचाने लगने लगें, तो वह शहर अपना लगने लगता है। अब वाकई यह शहर मुझे अपना सा लगने लगा है। छोटी गलियां, नुक्कड़, बाजार, जो कुछ उसने इन सालों में पहचानना सीखा है, वह सब मुझे पहचान कराता रहता है।
उपन्यास पढ़ पढ़कर मैं जितनी रोमांटिक हूं, एक्शन मूवी देखकर वह उतना ही रूखा। मुझे हैरानी होती है कि उसकी बीमारी के दिनों में भी उसने मुझे कभी अपने कमरे पर नहीं आने दिया। उस दिन चाय के अलावा वह मेरे कमरे में नहीं आया।
मैं ही उसके पीछे पड़कर उसके लिए नाश्ता या लंच ले जाती हूं। वह मेट्रो स्टेशन पर ही डिब्बे ले लेता है और अगर शाम को साथ नहीं लौट पाता, तो नीचे से फोन कर देता है और डिब्बे दरवाजे के सामने छोड़कर चला जाता है। कई बार मुझे उसकी इस हरकत पर बहुत गुस्सा आता है।
आज रविवार की शाम है और बेदिल्ली दिल्ली में जोरदार बारिश हो रही है। पिछले एक हफ्ते से वह घर गया हुआ है। आज भी नहीं आया क्या। मन करता है उसे फोन करूं, लेकिन जिद में मैंने नहीं किया।
कल तो उसे हर हाल में ऑफिस जाना है। मैसेज भी नहीं किया। पिछले हफ्ते उससे खूब लड़ाई हुई थी। कभी मूवी नहीं जाता, कभी होटल में साथ नहीं बैठता। बस बाजार का कोई काम कह दो, तो फौरन मान लेता है। ऑफिस के काम से कहीं जाना हो और रास्ता न पता हो, तो हाफ डे लेकर छोड़ आता है।
ईमानदार बॉडीगार्ड की तरह साए सा साथ रहता है। पिछले डेढ़ साल से एक दूसरे को जानते हैं। बाहर मिलते भी हैं, लेकिन आज तक किसी को भनक नहीं लगी। बिल्डिंग में, गली में कोई यह नहीं कह सकता कि मैं उसके साथ घूमती हूं।
पिछले हफ्ते मैंने उससे बहुत झगड़ा किया था। उस पर इल्जाम भी लगाए कि वह ऐसे ही लड़कियों को ठगता होगा, इसलिए मेरे साथ दूरी रखता है, ताकि दूसरी लड़कियों को ठग सके। वह संदिग्ध है और न जाने क्या क्या।
वह सिर्फ इतना ही बोला,
“घर जा रहा हूं। अगले रविवार शाम तक आ जाऊंगा।”
और मेट्रो की सीढ़ियां उतर गया।
मैंने पीछे से उसकी शर्ट पकड़ ली। मैं रोआंसी हो गई थी।
“मैंने अपने भैया को भी बता दिया है तुम्हारे बारे में। नाम नहीं बताया, लेकिन कहा है कि मुझे एक लड़का पसंद है। तुम समझते क्यों नहीं, मैं तुमसे प्यार करने लगी हूं।”
वह बस हंसा और बोला,
“अच्छा। चलो, आकर बात करता हूं।”
मैं पता नहीं कितनी देर स्टेशन पर खड़ी रही। बेकार में बाजार में भटकती रही। उसका मैसेज आया,
“अभी तक रूम पर क्यों नहीं पहुंची। कहां हो। रात हो रही है, घर जाओ।”
मुझे आश्चर्य हुआ, इसे कैसे पता चला कि मैं नहीं आई। जब परवाह ही नहीं है, तो कभी भी आऊं। फिर भी मैं नहीं गई। मेट्रो की सीढ़ियों पर बैठी रही।
तभी मैंने देखा, सामने से वह बरमूडा और टीशर्ट में चला आ रहा है। उसने कुछ नहीं कहा, बस घूरकर देखा और मैं चुपचाप उसके पीछे पीछे चल दी।
पिछला रविवार याद आ रहा है। उससे ज्यादा उसकी याद आ रही है। बेवकूफी में किए गए ऊटपटांग, तल्ख मैसेज याद आने लगे हैं। तभी दरवाजे पर चिरपरिचित थाप सुनाई दी। मैं दौड़कर दरवाजा खोलने गई।
सामने वह मुस्करा रहा था। मैंने उसे बहुत कम मौकों पर मुस्कराते देखा है। मैं कुछ कहती, उससे पहले ही उसकी आवाज आई,
“देहरी थोड़ी ऊंची है मां, संभलकर आइए।”
मैंने आश्चर्य से उसके चेहरे की तरफ देखा। वह बोला,
“मेरी मां हैं।”
मैंने नमस्ते के लिए हाथ जोड़े, तो उसकी मम्मी हंसकर बोलीं,
“अब तुम्हारी भी मां हूं।”
मैं और ज्यादा हैरान हुई, तो उन्होंने कहा,
“संजय ने बताया कि तुमने भाई को बता दिया है। मैंने कहा, फिर परिवार के स्तर पर ही बात कर लेते हैं।”
मैंने उसे तिरछी निगाह से देखा, तो उसकी मां ही बोल पड़ीं,
“मुझे तो यकीन ही नहीं आता कि तुम्हारे जैसी इतनी अच्छी लड़की मेरे भोले को पसंद कर सकती है। मैं एम्स हर महीने चेकअप के लिए आती हूं। अपनी बहन के यहां ठहरती हूं, पर इस बार तुम्हारे बारे में इतना सुना कि सीधे यहीं चली आई।”
उसके बाद पता नहीं कितने दिन बीते। आना जाना, शॉपिंग, मेहमान, रस्में। और जब हम दोनों आखिरकार अकेले मिले, तो मैंने बस इतना ही पूछा,
“तुमने तो पहले कभी कुछ कहा ही नहीं। सीधे मां को ले आए। अगर मैं मना कर देती तो।”
“तो क्या, मां फिर अपनी बहन के यहां चली जाती।”
“और तुम्हें दुख नहीं होता।”
“नहीं।”
“क्यों। दुख क्यों नहीं होता।”
“दुख तो तब होता जब मैं भी तुमसे प्यार करता। तुम तो गले पड़ गई थी। अगर मना करती, तो सोचता, चलो अच्छा हुआ पीछा छूटा।”
वह जोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा।
“सच बताना, तुम्हें कैसे पता था कि मैं मान जाऊंगी।”
“तुम्हें याद है, एक बार मैंने कहा था कि जब रास्ते पहचाने लगने लगें, तो शहर अपना लगने लगता है। लेकिन जब कोई चेहरा पहचाना सा लगने लगे, तो पूरी दुनिया अच्छी लगने लगती है। उस दिन मेट्रो में तुम्हारा चेहरा पहचाना सा लगने लगा था।”
-Vandana Aggrawal
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