काका बेहोश जैसे थे, लेकिन बीच-बीच में उनका सिर हिलता, हाथ ऊपर उठते। लोगों ने समझा कि शायद अब काका भगवान की ओर लौट रहे हैं। किसी ने धीरे से कहा, “देखो, काका हाथ ऊपर उठा रहे हैं… शायद प्रभु को याद कर रहे हैं…”
तभी एक आदमी जो चुपचाप सब देख रहा था, अचानक बोल पड़ा..
“बकवास मत करो! मैं जानता हूँ काका को। इन्हें बीड़ी चाहिए।”
फिर उसने जेब से बीड़ी निकाली, माचिस जलाई और काका के मुँह में बीड़ी लगा दी।
काका ने दो-तीन गहरे कश लिए, धुआँ छोड़ा… और फिर शांत होकर मर गए।
गीता चलती रही… लोग स्तब्ध रह गए।
दरअसल, काका की अंतिम इच्छा ‘भगवान’ नहीं, बीड़ी थी।
जैसे जीवन जिया था, वैसे ही अंत हुआ।
-OSHO
(शिक्षा)
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जैसे जीवन जिएंगे, अंत भी वैसा ही होगा।
जो आदतें और लतें जीवनभर रही हों, वे अंतिम समय में भी पीछा नहीं छोड़तीं। -
आखिरी समय में भगवान को याद करना आसान नहीं होता, अगर जीवन भर मन उसी ओर न गया हो।
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बदलाव जीवन में जल्दी करें, जब शरीर में ऊर्जा हो।
वृद्धावस्था या मृत्यु के करीब बदलाव की कोशिश करना बहुत मुश्किल हो जाता है। -
धार्मिक माहौल, शास्त्र या मंत्रों की उपस्थिति तभी असर करती है, जब भीतर सच में बदलाव आया हो।
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लत सिर्फ नशे की नहीं होती, मोह की, क्रोध की, लालच की भी होती है।
अगर समय रहते इन्हें न छोड़ा जाए तो वही जीवन का अंतिम सत्य बन जाती हैं।
इसलिए..अभी से जागो। जैसे अंत चाहते हो, वैसा जीवन बनाओ।
आदतों को सुधारो, मोह को छोड़ो, और समय रहते जीवन का रुख भीतर की ओर मोड़ो। यही सच्ची तैयारी है।
सरल विचार
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