एक बार बुद्ध एक गांव में गए। वहां कुछ लोग एक अंधे आदमी को उनके पास लाए। वे बड़े उत्साहित थे और बोले,
“भगवन, यह हमारा मित्र अंधा है। हम कई बार इसे समझाते हैं कि दुनिया में प्रकाश है, रोशनी है, सूरज चमकता है… लेकिन यह हमारी बात नहीं मानता। इसे यकीन ही नहीं होता कि ऐसा कुछ होता है।”
फिर वे आगे बोले,
“हम इसे समझाने की बहुत कोशिश करते हैं, लेकिन यह हमें उलझा देता है। यह कहता है, अगर सच में प्रकाश होता, तो मैं उसे छू पाता। मेरे हाथ हैं, तुम मुझे प्रकाश को छूने दो!”
“जब हम कहते हैं कि प्रकाश को छूना संभव नहीं, तो कहता है, ‘ठीक है, तो आवाज सुना दो। मेरे कान तो हैं, मैं सुनना चाहता हूँ कि प्रकाश कैसे बजता है।’
फिर कहता है, ‘अगर सुनना भी नहीं हो सकता, तो स्वाद ही चखा दो या कोई गंध सुंघा दो!’
अब बताइए, हम क्या करें?”
बुद्ध शांत थे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा,
“तुम लोग इस आदमी को गलत जगह ले आए हो। इसे मेरे पास नहीं, किसी वैद्य के पास ले जाना चाहिए था। इसे समझाने की नहीं, उपचार की ज़रूरत है। जब तक इसकी आंखें नहीं खुलेंगी, तब तक कोई इसे समझा नहीं सकता।”
“प्रकाश को देखने के लिए आंख चाहिए, न कि तर्क, विश्वास या बहस। तुम कहते रहो, यह सुनता रहेगा, लेकिन मानने से भी क्या होगा?
अगर यह कह दे कि ‘ठीक है, तुम कहते हो तो प्रकाश होगा’, फिर भी यह प्रकाश को देख तो नहीं पाएगा।”
“मैं उपदेश देने में विश्वास नहीं रखता। मैं तो धर्म को उपदेश नहीं, उपचार मानता हूँ। जब आंख ही नहीं है, तो देखेगा क्या?
पहले आंख हो, अनुभव की आंख। फिर समझाना जरूरी नहीं रहता। आदमी खुद देख लेता है।”
बुद्ध की यह बात सबको समझ में आ गई।
वे उस अंधे को एक वैद्य के पास ले गए। कुछ महीनों के इलाज के बाद उसकी आंखें ठीक हो गईं।
अब वह आदमी सब कुछ खुद देखने लगा, सूरज, चांद, रोशनी, रंग.. सब कुछ।
जब उसे पता चला कि बुद्ध अब पास के किसी और गांव में हैं, तो वह उनके पास गया।
उनके चरणों में झुका और बोला-
“भगवन, मैं गलती में था।
आप जो कहते थे, वह सही था। प्रकाश सच में था, लेकिन मेरी आंख नहीं थी। इसलिए मैं उसे देख नहीं पाया। और जब तक आंख नहीं थी, तब तक मैं सोचता रहा कि तुम सब झूठ बोल रहे हो। मुझे अंधा साबित करने के लिए तुमने प्रकाश की कल्पना कर ली है।”
बुद्ध ने उसे देखा और धीरे से कहा-
“हाँ, तू गलती में था… लेकिन तेरी जिद्द ने तुझे बचा लिया।
तू मान नहीं गया, तूने अंधे की तरह किसी की बात पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया।
तू कहता रहा, ‘जब तक खुद नहीं देखूंगा, मानूंगा नहीं।’ इसी बेचैनी ने तुझे आंख दिलाई।
अगर तू दूसरों की बातों पर चुपचाप विश्वास कर लेता, तो शायद तू कभी देखने की कोशिश ही नहीं करता।”
बुद्ध बोले,
“जो लोग बिना देखे, बिना अनुभव किए ही मान लेते हैं,
वे कभी सच्चाई तक नहीं पहुंचते।
जो अपने भीतर की बेचैनी को दबा देते हैं, वे खुद को खो देते हैं।
जो सत्य को सिर्फ सुनकर नहीं, बल्कि जीकर समझना चाहते हैं,
-Osho
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सत्य को जानने के लिए अपनी आंख खोलनी होती है, और वो आंख है अनुभव की।
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सिर्फ सुनने या मान लेने से कुछ हासिल नहीं होता, खुद देखना जरूरी है।
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धर्म, परमात्मा, प्रकाश… ये सब बातें सिर्फ तब समझ आती हैं जब भीतर देखने की योग्यता आ जाए।
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जो आंख बंद करके सब कुछ मान लेते हैं, वे अनुभव तक नहीं पहुंचते।
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बेचैनी जरूरी है, वही भीतर खोज की आग जलाती है।
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